अन्नदाता की मेहनत पर सबका भविष्य टिका है, फिर उसका वर्तमान इतना कठिन क्यों है?
किसान
सुबह गुरूर में था, दोपहर ने उसे चूर कर दिया,
धरती के पुत्र किसान को, हालात ने मजबूर कर दिया।
जिसके पसीने से हरियाली का श्रृंगार होता है,
उसी के हिस्से में अक्सर इंतज़ार होता है।
जो सबकी थाली भरता है अन्न के उपहार से,
वही जूझता रहता है कर्ज़, मौसम और बाज़ार से।
घनक का असर अब केवल तिहाई में रह गया,
स्वार्थ का सौदागर हर रिश्ते से बह गया।
अपनी ही परछाई से लोग अपरिचित हो गए,
मानवता के दीप कई अंधेरों में खो गए।
अकड़ में दरख़्त ने ज़मीन से रिश्ता तोड़ लिया,
जड़ों को भूलकर उसने आकाश ओढ़ लिया।
इसी भनक से हवाओं में सनक बढ़ गई,
मिट्टी की खुशबू भी जैसे कहीं बिखर गई।
खेतों की मेड़ों पर अब सन्नाटा बोलता है,
हर सूखा हुआ पौधा दर्द का राज़ खोलता है।
बादलों की बेरुख़ी और मौसम की मार में,
किसान खड़ा है आज भी उम्मीद के द्वार में।
वक्त बदलता है, यह सच्ची बात है,
हर दौर की अपनी अलग सौगात है।
पर सोचता हूँ, यह कैसा इंसाफ़ है,
क्यों हर संकट में किसान ही लाचार है?
जब शहर रोशन होते हैं उसकी मेहनत की लौ से,
क्यों उसका घर अंधेरा रहता है संध्या की छाँव से?
जब देश की तरक्की के गीत सुनाए जाते हैं,
क्यों उसके आँसू अक्सर अनसुने रह जाते हैं?
फिर भी वह हार नहीं मानता, बीज बोता है,
हर टूटे सपने के बाद भी नई आस संजोता है।
धरती का सीना चीरकर जीवन उगाता है,
अपने हिस्से का दुख पीकर जग को खिलाता है।
वक्त चाहे जितना बदले, यह पहचान रहेगा,
इस देश की धड़कनों में किसान का नाम रहेगा।
किरदार नहीं, वह इस राष्ट्र की जान है,
उसके सम्मान में ही भारत की शान है।
— गौतम झा
किसान
सुबह गुरूर में था, दोपहर ने उसे चूर कर दिया,
धरती के पुत्र किसान को, हालात ने मजबूर कर दिया।
जिसके पसीने से हरियाली का श्रृंगार होता है,
उसी के हिस्से में अक्सर इंतज़ार होता है।
जो सबकी थाली भरता है अन्न के उपहार से,
वही जूझता रहता है कर्ज़, मौसम और बाज़ार से।
घनक का असर अब केवल तिहाई में रह गया,
स्वार्थ का सौदागर हर रिश्ते से बह गया।
अपनी ही परछाई से लोग अपरिचित हो गए,
मानवता के दीप कई अंधेरों में खो गए।
अकड़ में दरख़्त ने ज़मीन से रिश्ता तोड़ लिया,
जड़ों को भूलकर उसने आकाश ओढ़ लिया।
इसी भनक से हवाओं में सनक बढ़ गई,
मिट्टी की खुशबू भी जैसे कहीं बिखर गई।
खेतों की मेड़ों पर अब सन्नाटा बोलता है,
हर सूखा हुआ पौधा दर्द का राज़ खोलता है।
बादलों की बेरुख़ी और मौसम की मार में,
किसान खड़ा है आज भी उम्मीद के द्वार में।
वक्त बदलता है, यह सच्ची बात है,
हर दौर की अपनी अलग सौगात है।
पर सोचता हूँ, यह कैसा इंसाफ़ है,
क्यों हर संकट में किसान ही लाचार है?
जब शहर रोशन होते हैं उसकी मेहनत की लौ से,
क्यों उसका घर अंधेरा रहता है संध्या की छाँव से?
जब देश की तरक्की के गीत सुनाए जाते हैं,
क्यों उसके आँसू अक्सर अनसुने रह जाते हैं?
फिर भी वह हार नहीं मानता, बीज बोता है,
हर टूटे सपने के बाद भी नई आस संजोता है।
धरती का सीना चीरकर जीवन उगाता है,
अपने हिस्से का दुख पीकर जग को खिलाता है।
वक्त चाहे जितना बदले, यह पहचान रहेगा,
इस देश की धड़कनों में किसान का नाम रहेगा।
किरदार नहीं, वह इस राष्ट्र की जान है,
उसके सम्मान में ही भारत की शान है।
— गौतम झा
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