ख्वाब

ख्वाब

ख्वाब कभी सुकून देते हैं, तो कभी सिखा जाते हैं—पर असली बात ये है कि हम उन्हें कैसे संभालते हैं।

ख्वाब

कुछ ख्वाबों को मैंने सबक सिखाया,
सबको एक गाँठ में बाँध के सुलाया।

बेवजह ही ये तितलियों सी फुदकती थी,
फालतू की ही रौनक फैलाती रहती थी।

कभी फूल, कभी शहद, कभी बगीचा,
बेमतलब ही सदा इतराती रहती थी।

मजबूरी में भी मुकम्मल साथ चाहिए,
दिन ही नहीं, इसे सारी रात चाहिए।।

कभी चाँद की चुप्पी में खो जाती थी,
कभी धूप में अपने रंग दिखाती थी।
बिन मौसम के सावन बन बरसती थी,
हर पल नई कहानी ये रच जाती थी।

मैंने समझाया, थोड़ा ठहर भी जा,
हर राह पे यूँ बिखरना छोड़ भी जा।
हर चाहत का हासिल होना जरूरी नहीं,
कुछ ख्वाबों को ख्वाब ही रहने दे ज़रा।

ये मानते नहीं, फिर भी मनाते रहे,
टूटे तो भी इन्हें हम उठाते रहे।
इनकी जिद में ही तो जिंदगी बसी है,
वरना हम कब के खुद को भुलाते रहे।

अब कुछ ख्वाब सलीके से सजाए हैं,
कुछ को दिल के कोने में छुपाए हैं।
जो सच बन सकें, उन्हें राह दी है,
बाकी को चुपचाप सुलाए हैं।।

-गौतम झा

 

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