रोशनी के इस पर्व में कहीं महलों की जगमगाहट है, तो कहीं खाली पेट और बुझते दीयों का अंधेरा। ‘दीपावली के रंग’ इसी विरोधाभास का मार्मिक आईना है।
दीपावली के रंग
मन-भोग लगाता कोई, पेट किसी का खाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
कहीं हजारों बिजली-लट्टू, दिन में भी जगमग करते,
कहीं उजाला करने जुगनू, रातों भर टिमटिम करते।
दीप किसी का तेल बिना ही, रह जाता क्यों खाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
सजी हुई है महफ़िल देखो, झूमें महल-अटारी भी,
सुरा-सुंदरी दोनों थिरकें, नयनों से चलती कटारी भी।
रात-रात भर चलते देखो, मुजरे और कव्वाली हैं,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
पास यहीं कुटिया में सुन लो, क्रंदन होता है कैसा,
मरणासन्न बूढ़ी का बेटा, जिसके पास नहीं है पैसा।
सर को पीट-पीटकर रोती, उसकी घरवाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
पाप नाशने मंदिर जाते, थाल सजाकर मेवा का,
धूप-पुष्प, अक्षत ले आते, पुण्य कमाने सेवा का।
पंडित जी भिजवा देते हैं, अपने घर वह थाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
अठखेली करता कहीं बुढ़ापा, मस्त रहे रंग-रलियों में,
कहीं तड़पती रहे जवानी, बदनामी की गलियों में।
एक है इनकी भी दीवाली, उनकी भी दीवाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
दीपावली के रंग
मन-भोग लगाता कोई, पेट किसी का खाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
कहीं हजारों बिजली-लट्टू, दिन में भी जगमग करते,
कहीं उजाला करने जुगनू, रातों भर टिमटिम करते।
दीप किसी का तेल बिना ही, रह जाता क्यों खाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
सजी हुई है महफ़िल देखो, झूमें महल-अटारी भी,
सुरा-सुंदरी दोनों थिरकें, नयनों से चलती कटारी भी।
रात-रात भर चलते देखो, मुजरे और कव्वाली हैं,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
पास यहीं कुटिया में सुन लो, क्रंदन होता है कैसा,
मरणासन्न बूढ़ी का बेटा, जिसके पास नहीं है पैसा।
सर को पीट-पीटकर रोती, उसकी घरवाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
पाप नाशने मंदिर जाते, थाल सजाकर मेवा का,
धूप-पुष्प, अक्षत ले आते, पुण्य कमाने सेवा का।
पंडित जी भिजवा देते हैं, अपने घर वह थाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
अठखेली करता कहीं बुढ़ापा, मस्त रहे रंग-रलियों में,
कहीं तड़पती रहे जवानी, बदनामी की गलियों में।
एक है इनकी भी दीवाली, उनकी भी दीवाली है,
मनती भारत में अब भी कुछ, ऐसी ही दीवाली है।।
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