वह स्वर जो कभी मौन नहीं हुआ: आशा भोंसले को समर्पित

वह स्वर जो कभी मौन नहीं हुआ: आशा भोंसले को समर्पित

वह स्वर जो कभी मौन नहीं हुआ

वह स्वर जो कभी मौन नहीं हुआ
वह जन्मी थी किसी सहज सुबह की तरह नहीं,
न ही किसी निश्चित उजाले में—
बल्कि उन दिनों में,
जहाँ सुरों का घर था,
पर जीवन अब भी संघर्ष की धूप में तपता था।

एक नन्ही आँखों में जिद लिए लड़की,
जो समय से पहले समझ गई थी—
कि केवल प्रतिभा से राह नहीं बनती,
उसे अपने स्वर से रास्ते तराशने पड़ते हैं।


संगीत के आँगन में पहले से ही
अनेक आवाज़ें गूंजती थीं,
और वह खड़ी थी—
न किसी की छाया बनकर,
बल्कि एक अनकही धुन की तरह,
जो बस सुन लिए जाने की प्रतीक्षा में थी।

कभी-कभी अस्वीकार
भूख से भी भारी लगने लगता,
और माइक उससे दूर—
जैसे कोई सपना
जिसे छूने के लिए अभी कई जन्म बाकी हों।

पर उसने हार नहीं मानी।
वह गाती रही।

टूटे अवसरों के बीच,
उन गीतों में जिन्हें कोई अपनाना नहीं चाहता था,
उन रातों में जो थमती ही नहीं थीं,
और उन सुबहों में
जो उम्मीद से खाली थीं—
वह गाती रही।


उसकी आवाज़ केवल ध्वनि नहीं थी—
वह जिद थी,
जो हर सुर में ढलती गई,
वह साहस था,
जो हर लय में धड़कता रहा।


समय—जो सब देखता है,
धीरे-धीरे उसकी ओर झुकने लगा।
छोटे स्टूडियो से निकलकर
वह विशाल परदों तक पहुँची,
और उसका स्वर—
न जल्दी में,
न किसी प्रमाण की चाह में,
बस अपनी सच्चाई के साथ बहता गया।


वह एक भाव में सीमित नहीं थी।
वह कभी चंचल हँसी बनी,
तो कभी प्रेम का कोमल स्पर्श,
कभी विरह की चुभन,
तो कभी भक्ति की असीम शांति।


वह अनेक थी,
पर हर रूप में वही थी।
वर्ष बीतते गए—
और उसके गीत
देश की धड़कनों में बसते गए।

घर-घर में,
राहों में,
और उन खामोश पलों में
जहाँ कोई अपने आप से मिलता है।


वह केवल गायिका नहीं थी,
वह स्मृति बन गई थी।
समय के साथ बहुत कुछ बदला,
स्वर बदले, रुझान बदले,
पर उसका स्वर—
स्थिर रहा,
गूंजता रहा,
जैसे किसी नदी का प्रवाह
जो थमता नहीं।
सम्मान आए—
और आने ही थे,
जैसे दुनिया ने
उसकी यात्रा को स्वीकार लिया हो।


पर उसका असली पुरस्कार
कभी ताली या पदक नहीं था।
वह था—
एक माँ की लोरी में उसका गीत,
एक प्रेमी की यादों में उसका सुर,
एक अनजान व्यक्ति के अकेलेपन में
उसकी आवाज़ का सहारा।
उसका स्वर एक सेतु बन गया—
पीढ़ियों के बीच,
भाषाओं के पार,
दिलों को जोड़ता हुआ।


और समय की रेखाएँ
उसके चेहरे पर भले ही उतर आईं,
पर उसके गीत—
अमर रहे।
क्योंकि दंतकथाएँ समाप्त नहीं होतीं,
वे गूंजती हैं।
और उसकी गूंज—
वर्षों में नहीं,
बल्कि उन अनगिनत जीवनों में बसती है
जिन्हें उसने छुआ है।


वह केवल याद नहीं की जाती—
वह सुनी जाती है।
हर उस स्वर में
जो डर से ऊपर उठता है,
हर उस सपने में
जो हार मानने से इंकार करता है—वह जीवित है।

-गौतम झा

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