तुम याद आते हो
तुम याद आते हो—
शाम के सितारों में नहीं,
तेज़ दोपहरी में।
तुम याद आते हो—
संकोच भरी बूंदा-बांदी में नहीं,
तेज़ बारिश में।
तुम याद आते हो—
सपाट, सुलझे रास्तों पर नहीं,
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर।
तुम याद आते हो—
खोखले ख़यालों में नहीं,
बेहद गहरे विचारों में।
तुम याद आते हो—
पलटते हुए पन्नों में नहीं,
पढ़ी जाती कहानियों में।
तुम याद आते हो—
लिखी जाती कविता में नहीं,
सुनी जाती ग़ज़ल में।
— गौतम झा