तुम याद आते हो

तुम याद आते हो

कुछ लोग दूर चले जाते हैं, लेकिन उनकी यादें हर उस पल लौट आती हैं जब ज़िंदगी सबसे ज़्यादा ख़ामोश होती है। यह कविता उसी अनकहे एहसास की कहानी है।

तुम याद आते हो

तुम याद आते हो...
शाम के सितारों में नहीं,
तपती हुई दोपहर में।

तुम याद आते हो...
संकोच भरी फुहारों में नहीं,
मूसलाधार बारिश में।

तुम याद आते हो...
सीधी-सपाट राहों पर नहीं,
भटकी हुई पगडंडियों पर।

तुम याद आते हो...
उड़ते हुए ख़यालों में नहीं,
गहरे उतरते विचारों में।

तुम याद आते हो...
यूँ ही पलटते पन्नों में नहीं,
ठहरकर पढ़ी गई कहानियों में।

तुम याद आते हो...
लिखी जाती कविताओं में नहीं,
धीरे-धीरे गुनगुनाई जाती ग़ज़लों में।

क्योंकि कुछ लोग
याद नहीं किए जाते,
वे तो हर उस पल में उतर आते हैं
जब मन
अपने ही भीतर लौट जाता है।

गौतम झा

 

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