नारी—उषा की पहली किरण

नारी—उषा की पहली किरण

नारी शक्ति

जब विश्व की थकी हुई आंखें
क्षितिज की ओर उठती हैं,
भारत की धरती से
एक शांत ज्योति उगती दिखाई देती है
वह ज्योति है नारी की।

वह अब केवल
घर की चौखट पर रखा दीपक नहीं,
वह स्वयं उगता हुआ सूरज है,
जिसकी किरणें
अंधकार से संवाद करती हैं।

कभी जिसे परंपराओं की जंजीरों में
सदियों तक बांध कर रखा गया,
आज वही नारी
अपने स्वप्नों के आकाश में
पंख फैलाकर उड़ रही है।

उसके कदमों की आहट
अब केवल आंगन तक सीमित नहीं,
वह संसद के गलियारों में गूंजती है,
विज्ञान की प्रयोगशालाओं में चमकती है,
और अंतरिक्ष की निस्तब्धता में
तारों से बात करती है।

विश्व आज आश्चर्य से देखता है
भारत की बेटियां
मिट्टी से उठकर
इतिहास की नई इबारत लिख रही हैं।

वह खेतों की हरियाली में
मेहनत का गीत है,
वह विद्यालयों में
ज्ञान का उजला दीप है,
और संघर्ष के पथ पर
अटूट साहस की नदी है।

परंतु,
सशक्तिकरण केवल अधिकारों की ध्वनि नहीं,
यह आत्मा की वह मौन क्रांति है
जहाँ नारी
स्वयं को पहचानती है
अपनी शक्ति,
अपनी करुणा,
और अपनी अनंत सृजनशीलता को।

जब एक नारी उठती है,
तो केवल एक जीवन नहीं बदलता,
पूरी सभ्यता
एक नई दिशा में चल पड़ती है।

आज विश्व की दृष्टि
भारत की ओर है
जहाँ नारी
बंधन की कथा नहीं,
स्वतंत्रता की कविता बन रही है।

और जब भविष्य
अपने स्वर्णिम पन्ने खोलेगा,
तो उसमें लिखा होगा

कि इस युग में
भारत की नारी ने
सिर्फ अपने लिए नहीं,
पूरे विश्व के लिए
आकाश को थोड़ा और विस्तृत कर दिया।

 — गौतम झा

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