डिजिटल इश्क
तुम्हारी उम्मीद रोज़-रोज़ जलती है…
फिर भी ख़ाक नहीं होती।
अजीब ख़्वाब हैं “मेरे”…
बुझते हैं, मगर राख नहीं होते।
किसी ने कहा ही नहीं—आती है ‘वो’,
बारिश की काग़ज़ी नाव हो गई है ‘वो’।
जो भी हो, दुनिया ‘डिजिटल’ हो गई,
और मेरा इश्क़ ‘अशर्फ़ी की पोटली’ हो गई।
स्टेटस में मुस्कान, चैट में खामोशी,
रील्स में हँसी, दिल में बेहोशी।
नीली टिक ने रिश्ते नाप दिए,
भावनाओं को बस “seen” पर छोड़ दिए।
उँगलियों से छू ली जाती है चाहत,
आवाज़ की गर्मी अब लगती है आदत।
इमोजी ने लफ़्ज़ों को छोटा कर दिया,
दिल को दिल से मिलना महँगा कर दिया।
कभी जो चिट्ठियों में साँस लेती थी बात,
अब नेटवर्क पर अटकी है हर एक रात।
कनेक्शन तेज़ है, मगर दिल स्लो है,
सब कुछ सामने है, फिर भी कुछ missing-सा है।
फिर भी इस शोर में मैं ठहरा रहा,
पुराने ज़माने का इश्क़ ढोता रहा।
क्योंकि स्क्रीन के पार जो धड़कता है दिल,
वो आज भी असली है—बिल्कुल real।
-गौतम झा
Gunja
1 year agoअंतिम की दो पंक्तियाँ.......????
Gunja
1 year agoअंतिम की दो पंक्तियाँ.......wowww
SN Choudhary
1 year agoबहुत बढ़िया ।।