डिजिटल इश्क

डिजिटल इश्क

डिजिटल इश्क

तुम्हारी उम्मीद रोज़-रोज़ जलती है
फिर भी ख़ाक नहीं होती।

अजीब ख़्वाब हैंमेरे”…
बुझते हैं, मगर राख नहीं होते।

किसी ने कहा ही नहींआती हैवो’,
बारिश की काग़ज़ी नाव हो गई हैवो

जो भी हो, दुनियाडिजिटलहो गई,
और मेरा इश्क़अशर्फ़ी की पोटलीहो गई।

स्टेटस में मुस्कान, चैट में खामोशी,
रील्स में हँसी, दिल में बेहोशी।
नीली टिक ने रिश्ते नाप दिए,
भावनाओं को बस “seen” पर छोड़ दिए।

उँगलियों से छू ली जाती है चाहत,
आवाज़ की गर्मी अब लगती है आदत।
इमोजी ने लफ़्ज़ों को छोटा कर दिया,
दिल को दिल से मिलना महँगा कर दिया।

कभी जो चिट्ठियों में साँस लेती थी बात,
अब नेटवर्क पर अटकी है हर एक रात।
कनेक्शन तेज़ है, मगर दिल स्लो है,
सब कुछ सामने है, फिर भी कुछ missing-सा है।

फिर भी इस शोर में मैं ठहरा रहा,
पुराने ज़माने का इश्क़ ढोता रहा।
क्योंकि स्क्रीन के पार जो धड़कता है दिल,
वो आज भी असली हैबिल्कुल real

 -गौतम झा

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3 Comments

  •  
    Gunja
    2 years ago

    अंतिम की दो पंक्तियाँ.......????

  •  
    Gunja
    2 years ago

    अंतिम की दो पंक्तियाँ.......wowww

  •  
    SN Choudhary
    2 years ago

    बहुत बढ़िया ।।