अक्षरों का अनंत विस्तार
मौन खड़ी ये आलमारियाँ, इतिहास स्वयं गुनगुनाता है,
पन्नों की हर सिलवट में, मानव अपना चेहरा पाता है।
स्याही-कागज़ का ढेर नहीं, ये जीवन की धड़कन हैं,
इनमें बसते विचार अमर, जिनसे हम आज भी स्पंदन हैं।
पुस्तक केवल सूचना नहीं, संवेदना का विस्तार हैं,
मन के सूने आँगन में, जागृत करतीं सत्कार हैं।
ज्ञान नहीं बस देतीं ये, चेतन दीप जलाती हैं,
भीतर सोई मानवता को, फिर से राह दिखाती हैं।
कभी तपते रेगिस्तान में, शीतल छाया बन जातीं,
कभी भटकी चेतना को, नाव-सी राह दिखातीं।
जब जग का कोलाहल बढ़ता, ये मौन वरदान बनती हैं,
सूनी बंजर धरती पर, नव-अरमानों की ऋतु रचती हैं।
जब तर्कों के पथ धुँधले हों, ये मशाल जलाती हैं,
सीमाएँ समय-स्थान की, पल में लांघ दिखाती हैं।
शस्त्रों की धार कुंद पड़े, समय उन्हें हर लेता है,
शब्दों की शक्ति अमर रहे, युग-युग तक जीता है।
ये खिड़की हैं उन लोकों की, जहाँ सभ्यताएँ बसती हैं,
सात समंदर पार की धड़कन, आँखों में आ बसती है।
बिना कहीं भी गए हुए, संवाद युगों से होता है,
ऋषियों, मनीषियों के संग, मन स्वयं ही संजोता है।
संघर्ष, उत्सव, अनुभव सब, इन पन्नों में जीवित हैं,
इतिहासों के साक्ष्य बने, ये कालातीत प्रतिष्ठित हैं।
डिजिटल इस आपाधापी में, एक संकल्प जगाना है,
पुरानी पुस्तकों की खुशबू, फिर से मन में बसाना है।
स्क्रीन के शोर से दूर कहीं, शब्दों में विश्राम करें,
शांति की उस गहराई में, फिर अपना अवतार करें।
जिस घर में पुस्तकों का कोना, चुपचाप नहीं मुस्काता,
वहाँ सूचना तो रहती है, पर मन सुकून नहीं पाता।
आओ इस शुभ अवसर पर, एक पन्ना फिर पलटें हम,
अक्षरों की उस दुनिया में, खुद को फिर से गढ़ें हम।
-गौतम झा