आधा सुख, आधा दुख, जीवन चाँद सा है कुछ-कुछ।
सुख-दुख
आधा सुख, आधा दुख,
जीवन चाँद सा है कुछ-कुछ।
कभी धूप की तपिश मिले,
कभी छाँव लगे कुछ-कुछ।
दिन की दहशत से दूर कहीं,
रात का सुकून है कुछ-कुछ।
कभी आँखों में नींद रहे,
कभी ख्वाब जगे कुछ-कुछ।
इस जीवन की अजब फितरत,
करती है मजबूर कुछ-कुछ।
धक-धक करती दिल की धुन,
शून्य में रोए कुछ-कुछ।
रोशनी का नूर भी अपना,
अँधेरा कोहिनूर भी कुछ-कुछ।
फिक्र में डूबा सुरूर यहाँ,
होश में बेहोशी कुछ-कुछ।
हद भी अपनी हद में कहाँ,
बेहद की मजबूरी कुछ-कुछ।
दहाई में दोष छिपा बैठा,
इकाई में बेहोशी कुछ-कुछ।
गिनते-गिनते उम्र गई,
बाकी है जिंदगी कुछ-कुछ।
दिन की अपनी दया यहाँ,
रात की अपनी माया कुछ-कुछ।
दिन भी हमसे रूठा-रूठा,
रात भी लगती पराई कुछ-कुछ।
धूप मिले तो छाँव की चाहत,
छाँव मिले तो धूप कुछ-कुछ।
हँसी मिले तो आँसू याद आएँ,
आँसू में भी हँसी कुछ-कुछ।
जीत मिली तो हार का डर है,
हार में जीत छिपी कुछ-कुछ।
पास रहे तो दूरी खलती,
दूर रहें तो पास कुछ-कुछ।
रिश्तों की इस भीड़ में अक्सर,
अपना भी लगता गैर कुछ-कुछ।
दुनिया जैसी हमने देखी,
वैसी ही है भली कुछ-कुछ।
यहाँ खुशी भी पूरी कहाँ है,
दुख भी पूरा दुख नहीं कुछ-कुछ।
दिन-रात यही खेल पुराना,
छाया धूप बनी कुछ-कुछ।
जीवन आखिर जीवन ही है,
आधा सच, आधा भ्रम कुछ-कुछ।
आधा सुख, आधा दुख,
जीवन चाँद सा है कुछ-कुछ।
— गौतम झा
सुख-दुख
आधा सुख, आधा दुख,
जीवन चाँद सा है कुछ-कुछ।
कभी धूप की तपिश मिले,
कभी छाँव लगे कुछ-कुछ।
दिन की दहशत से दूर कहीं,
रात का सुकून है कुछ-कुछ।
कभी आँखों में नींद रहे,
कभी ख्वाब जगे कुछ-कुछ।
इस जीवन की अजब फितरत,
करती है मजबूर कुछ-कुछ।
धक-धक करती दिल की धुन,
शून्य में रोए कुछ-कुछ।
रोशनी का नूर भी अपना,
अँधेरा कोहिनूर भी कुछ-कुछ।
फिक्र में डूबा सुरूर यहाँ,
होश में बेहोशी कुछ-कुछ।
हद भी अपनी हद में कहाँ,
बेहद की मजबूरी कुछ-कुछ।
दहाई में दोष छिपा बैठा,
इकाई में बेहोशी कुछ-कुछ।
गिनते-गिनते उम्र गई,
बाकी है जिंदगी कुछ-कुछ।
दिन की अपनी दया यहाँ,
रात की अपनी माया कुछ-कुछ।
दिन भी हमसे रूठा-रूठा,
रात भी लगती पराई कुछ-कुछ।
धूप मिले तो छाँव की चाहत,
छाँव मिले तो धूप कुछ-कुछ।
हँसी मिले तो आँसू याद आएँ,
आँसू में भी हँसी कुछ-कुछ।
जीत मिली तो हार का डर है,
हार में जीत छिपी कुछ-कुछ।
पास रहे तो दूरी खलती,
दूर रहें तो पास कुछ-कुछ।
रिश्तों की इस भीड़ में अक्सर,
अपना भी लगता गैर कुछ-कुछ।
दुनिया जैसी हमने देखी,
वैसी ही है भली कुछ-कुछ।
यहाँ खुशी भी पूरी कहाँ है,
दुख भी पूरा दुख नहीं कुछ-कुछ।
दिन-रात यही खेल पुराना,
छाया धूप बनी कुछ-कुछ।
जीवन आखिर जीवन ही है,
आधा सच, आधा भ्रम कुछ-कुछ।
आधा सुख, आधा दुख,
जीवन चाँद सा है कुछ-कुछ।
— गौतम झा
Leave a Comment