राय का पहाड़

राय का पहाड़

जब राय पहाड़ बन जाए और सवाल दबने लगें, तब लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है।

राय का पहाड़

राय का पहाड़ बनते सुना है,
समय का दबाव जब बढ़ता है।
राय कभी कहीं ठहरती नहीं,
पर पहाड़ कहाँ जल्दी बदलता है।

जिसने एकांत में समय गुजारा,
अपने भीतर खुद को निहारा,
अथक अभ्यास को साथी माना,
विचारों को अपना हथियार माना,
संसार में वही कुछ नया करे,
जो अपने विचारों पर विश्वास धरे।
भीड़ के पीछे चलना आसान है,
अपनी राह बनाना ही पहचान है।

चाय से देखो चमत्कार हुआ,
दशक भर में लगातार हुआ।
चायवाला हो या शराबवाला,
फिजिक्सवाला हो या कोई निराला,
हर कोई अपने ढंग से महान हुआ,
हर दावा जैसे बेमिसाल हुआ।

छप्पन इंच का सीना है,
सीमा पर अडिग रहना है।
अक्साई चिन का सवाल पुराना,
फिर भी हर भाषण में नया तराना।
बांग्लादेश में बदली कहानी,
हसीना की भी बीती रवानी।
बलूचिस्तान तक चर्चा पहुँची,
दुनिया ने अपनी राय भी पूछी।
राष्ट्रवाद के ऊँचे नारों में,
सवाल दबे अखबारों में।

संसद में सहयोग का प्रयोग है,
समिति में विपक्षी का योग है।
भाषण में संवाद की बात बड़ी,
फिर सदन में दीवार खड़ी।
हर फैसले पर गतिरोध है,
जनतंत्र में विरोध का रोग है।
बहस हुई तो शोर मचा,
शोर थमा तो सदन रुका।
सत्ता अपनी बात सुनाती है,
विपक्ष अपनी बात दोहराता है,
जनता दोनों को देख रही,
और अपनी बारी की राह तक रही।

कागज पर विकास की रफ्तार है,
हर योजना में नया विस्तार है।
सड़क बनी तो विकास हुआ,
पुल बना तो विश्वास हुआ।
घर मिला तो उपलब्धि बड़ी,
राशन मिला तो तस्वीर खिंची।
उज्ज्वला आई, चूल्हा जला,
फिर महँगाई ने हिसाब लिया।

आवास, राशन, उज्ज्वला योजना,
लाचारी की भी अपनी कहानी है।
योजना अगर सहारा बन जाए,
तो अच्छी बात पुरानी है।
पर जब अधिकार को एहसान कहेंगे,
तब शब्दों से ही शासन करेंगे।
योजनाओं को अगर विकास कहेंगे,
तो सचमुच परिभाषा पर परिहास करेंगे।

पढ़ाई से बेरोजगारी बढ़ती है,
डिग्री हाथ में लेकर भीड़ खड़ी है।
किताबों में सपनों का संसार है,
बाहर नौकरी की लंबी कतार है।
शिक्षा की हालत अजीब हुई,
फीस बढ़ी, उम्मीद गरीब हुई।
कक्षा में ज्ञान की कमी नहीं,
पर अवसर की कोई गारंटी नहीं।

युवा के हाथ में प्रमाणपत्र है,
आँखों में फिर भी प्रश्नचिह्न है।
कहते हैं कौशल सीखो, आगे बढ़ो,
पर नौकरी मिले तो पहले जाँचो।
अनुभव माँगे पहला रोजगार,
यह कैसा है अवसर का व्यापार?
बेरोजगार से अनुभव माँगते हैं,
फिर अनुभवहीन को दोषी ठहराते हैं।

किसान की अपनी चिंता है,
मजदूर की अलग कहानी है।
शहरों में किराए का बोझ है,
गाँवों में सूनी जवानी है।
महँगाई अपनी चाल चलती है,
जेब चुपचाप खाली होती है।
आँकड़ों में सब ठीक दिखाई दे,
पर थाली खुद सचाई कहती है।

राय का पहाड़ बड़ा अजीब है,
हर शिखर पर अपना-अपना नसीब है।
कोई इसे विकास बताता

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