मेरी क़लम और मैं

मेरी क़लम और मैं

एक कलम, कुछ कागज़ और अनकहे सवाल। यह कविता उस बेचैन मन की आवाज़ है जो सच लिखने से डरता नहीं, भले ही दुनिया उससे नाराज़ क्यों न हो।

मेरी क़लम और मैं

साँस यक़ीनन मद्धम है, मुमकिन है कि मेरी आँख भी नम है,
क्या आज फिर मेरी क़लम के चंद कागज़ चूमने का मौसम है।।

चश्मा मेरी आँख पे है, चश्मा उसकी आँख पे भी तो है,
किस मुँह से कहता है वो मुझसे, तेरी सोच ज़रातंगहै।।

मेरी समझ से जो हैं संगदिल, वही ख़ुलूस--सुख़न से हैं महरूम,
यही बशर करते फिरते हैं ऐलान, दुनिया में अबवफ़ाकम है।।

सीखा मल्लाहों से दोस्ती का फ़न, हवाओं की तासीर का इल्म,
कश्ती भँवर में ही सही, पर कैसे कह देराज़’, कि दरिया में पानी कम है।।

जो लफ़्ज़ ज़ुबाँ तक सके, मेरी क़लम उन्हें आवाज़ देती है,
जो दर्द किसी से कह सकूँ, मेरी स्याही वही पैग़ाम देती है।
कभी ख़ामोशी भी बोल उठे, कभी लफ़्ज़ों में कोई मातम है,
क्या आज फिर मेरी क़लम के चंद कागज़ चूमने का मौसम है।।

मैंने देखा है शहरों में, चेहरों पर कितने चेहरे रहते हैं,
कुछ लोग हँसते रहते हैं, कुछ अंदर ही अंदर मरते रहते हैं।
हर शख़्स यहाँ आईना लेकर, दूसरे का चेहरा पढ़ता है,
पर अपने ही अक्स से पूछे कौन, कि दिल में कितना आलम है।।

बाज़ारों में बिकते देखे, रिश्ते भी और एहसास भी मैंने,
कुछ सिक्कों में तौले जाते, कुछ नामों में बिकते ख़्वाब भी मैंने।
जिसे दुनिया ने फ़ायदा समझा, मैंने उसको ज़ख़्म समझा,
जिसे लोग कहते हैं सौदा, मेरी नज़र में वही तो मातम है।।

कभी सच लिखूँ तो अपने ही, मुझसे नाराज़ हो जाते हैं,
कभी झूठ की महफ़िल में सच के, क़ातिल सरताज हो जाते हैं।
मैं फिर भी अपनी राह चलूँ, चाहे काँटों का मौसम हो,
मेरी क़लम का काम यही है, सच कहना ही उसका धरम है।।

मैं फ़तवे लिखने बैठा, मैं कोई फ़ैसला सुनाता हूँ,
जो देखा, जो भोगा, उसको बस कागज़ पर रख जाता हूँ।
मेरी क़लम तलवार सही, पर धार अभी भी बाक़ी है,
स्याही सूखी लगती है लेकिन, दिल में अब भी इक आलम है।।

कभी उम्मीद की लौ लिखता हूँ, कभी रात का गहरा सन्नाटा,
कभी किसी माँ की आँखों में, देखता हूँ टूटा हुआ सपना।
कभी किसी मज़दूर के हाथों की, रेखाओं में कल पढ़ता हूँ,
हर चेहरे की अपनी कहानी, हर आँख में कोई मौसम है।।

मेरी क़लम से पूछो आख़िर, क्यों इतना बेचैन है मन मेरा,
क्यों हर ख़ामोशी के पीछे, सुनता हूँ कोई प्रश्न अधूरा।
शायद दुनिया बदल पाए, मेरी छोटी-सी कोशिश से,
लेकिन जब तक साँस चलेगी, लिखना ही मेरा मरहम है।।

साँस यक़ीनन मद्धम है, मुमकिन है कि मेरी आँख भी नम है,
फिर भी आज मेरी क़लम के चंद कागज़ चूमने का मौसम है।
जो कहना है कह दूँ खुलकर, चाहे दुनिया नाराज़ ही क्यों

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment