गरीबी सिर्फ जेब खाली नहीं करती, वह पहचान और सपनों पर भी बोझ डालती है। अमीरी के बीच भी इंसान कितना अकेला है, यही कविता का सबसे बड़ा सवाल है।
गरीबी और अमीरी का खेल
गरीबी और अमीरी का जो खेल चलता है,
इंसान की कीमत पर बस मोल लगता है।
गरीबी तो अक्सर पहचान मिटा देती है,
कंधों पर बोझ का एक मकान बना देती है।
हथेलियों पर पसीना, चेहरे पर धूप है,
रोज़ का यही जीवन, पीड़ा के अनुरूप है।
आभूषणों में छिपी मन की खामोशी है,
बंद कमरों में शब्दों की मदहोशी है।
रंग-रूप से नाता है, सबको वही भाता है,
आनंद ही राजा है, सच को कौन अपनाता है?
आर्थिक संग्राम का पूरा इंतज़ाम है,
फिर गाँव को क्यों इसका अनुमान नहीं है?
मर्द की मजबूरी में औरत अधूरी है,
दुविधा की दिलेरी में धर्म की पहेली है।
क्या यह सचमुच सोचने की बात है?
खुद से पूछो, आखिर यह किसका अपराध है?
हम सब एक ही धागे की कड़ियाँ हैं,
सपनों की दुनिया में अपनी अठखेलियाँ हैं।
फिर क्यों कोई अमीर, कोई गरीब कहलाता है?
इंसान का इंसान से भेद कौन बनाता है?
— गौतम झा
गरीबी और अमीरी का खेल
गरीबी और अमीरी का जो खेल चलता है,
इंसान की कीमत पर बस मोल लगता है।
गरीबी तो अक्सर पहचान मिटा देती है,
कंधों पर बोझ का एक मकान बना देती है।
हथेलियों पर पसीना, चेहरे पर धूप है,
रोज़ का यही जीवन, पीड़ा के अनुरूप है।
आभूषणों में छिपी मन की खामोशी है,
बंद कमरों में शब्दों की मदहोशी है।
रंग-रूप से नाता है, सबको वही भाता है,
आनंद ही राजा है, सच को कौन अपनाता है?
आर्थिक संग्राम का पूरा इंतज़ाम है,
फिर गाँव को क्यों इसका अनुमान नहीं है?
मर्द की मजबूरी में औरत अधूरी है,
दुविधा की दिलेरी में धर्म की पहेली है।
क्या यह सचमुच सोचने की बात है?
खुद से पूछो, आखिर यह किसका अपराध है?
हम सब एक ही धागे की कड़ियाँ हैं,
सपनों की दुनिया में अपनी अठखेलियाँ हैं।
फिर क्यों कोई अमीर, कोई गरीब कहलाता है?
इंसान का इंसान से भेद कौन बनाता है?
— गौतम झा
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