सुमन के दर्शन

सुमन के दर्शन

स्मृतियों की धुंध, मौन की गहराई और अनकहे प्रेम की सुगंध से सजी यह कविता अंतर्मन की उस यात्रा को शब्द देती है, जहाँ हर खोज अंततः अपने सुमन के दर्शन पर आकर ठहर जाती है।

सुमन के दर्शन

स्मृतियों के भँवर को माथे की शिकन में कैद कर लिया,
उठती हर टीस को मैंने एक मौन मुस्कुराहट में समेट लिया।
जो अधूरी सी पीड़ा थी भीतर कहीं सिमटी हुई,
उसे भी जीवन के अर्थों में धीरे-धीरे समेट लिया।

सीप में मोती की तरह स्पर्श की अनुभूति को सहेज लिया,
संवेदनाओं के अनंत सागर को धैर्य के तट पर रोक लिया।
हर टूटते पल की खनक को मैंने शब्दों में ढाल दिया,
और मौन की भाषा को भी भीतर ही भीतर पाल लिया।

माना कि मूल्य नहीं है सुखद क्षण का उसके अंतर्मन में,
फिर भी क्यों उसकी छाया ठहरती है मेरे हर एक भ्रम में।
क्यों ये हलचल, ये कंपन मेरे ही भीतर बस जाता है,
और समय का हर एक टुकड़ा मुझसे कुछ कह जाता है।

तुम कमल हो मेरे अवचेतन मन के शांत तल पर,
जहाँ विचार भी मौन हैं किसी अनकहे से कल पर।
मैं सुगंध बन भटकता हूँ तुम्हारे ही आभासों में,
अपने ही सुमन के दर्शन को खोजता हूँ सांसों में।

और जब भी आँखें बंद कर उस भीतर की दुनिया को छूता हूँ,
तुम्हें ही हर ओर बिखरा हुआ, मैं मौन में भी ढूँढ़ता हूँ।

गौतम झा

 

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4 Comments

S
Sanjiv Thakur
1 year ago
Full of Romance. ???? keep writing
InsightfulTake Team
Thank you for sharing your thoughts. We appreciate your feedback and engagement with InsightfulTake.
S
Sanjiv Thakur
1 year ago
Full of Romance. ???? keep writing
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K
Kamlesh Kumar
1 year ago
ये तो जबर्दश्त है!
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K
Kamlesh Kumar
1 year ago
ये तो जबर्दश्त है!
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