पिता की स्मृतियों में छिपे त्याग, जिम्मेदारी और स्नेह को याद करती यह कविता बदलती पीढ़ियों के बीच रिश्तों में आती दूरी का दर्द भी बयां करती है।
पिता की स्मृति
कुछ स्मृतियाँ होती हैं बेहद प्यारी,
जिन पर टिकी होती जीवन की नींव सारी।
राह जैसी हो, सँकरी, समतल या ऊबड़-खाबड़,
पिता चलते रहे, न हुए कभी बेख़बर।
जिम्मेदारी शायद उनका जुनून था,
ऊबना न जाने, ऐसा उनका खून था।
तारीख बदलना कैलेंडर में निहित था,
उनके लिए हर दिन कर्म में समर्पित था।
विचारों का मन में पहाड़-सा दबाव था,
संतोष से संतुलन उनका मौलिक स्वभाव था।
मेहनत ही जीवन का उनका संसाधन था,
बदलती दुनिया से जैसे उनका अलगाव था।
पतझड़ के पीले पत्तों जैसा त्याग था,
बंजर धरती से भी असीम अनुराग था।
बेटी घर बसा ले, यही सतत ख्याल था,
अपने लिए तो बस दो रोटियों का सवाल था।
बेटा बड़ा हुआ, वैभव से दो-चार हुआ,
आत्मीयता के रथ पर जैसे आक्रमण सवार हुआ।
ममता की दुविधा में पिता बेबस हुआ,
आती-जाती पीढ़ियों के बीच
वह भी कहीं अकेला हुआ।
गौतम झा
पिता की स्मृति
कुछ स्मृतियाँ होती हैं बेहद प्यारी,
जिन पर टिकी होती जीवन की नींव सारी।
राह जैसी हो, सँकरी, समतल या ऊबड़-खाबड़,
पिता चलते रहे, न हुए कभी बेख़बर।
जिम्मेदारी शायद उनका जुनून था,
ऊबना न जाने, ऐसा उनका खून था।
तारीख बदलना कैलेंडर में निहित था,
उनके लिए हर दिन कर्म में समर्पित था।
विचारों का मन में पहाड़-सा दबाव था,
संतोष से संतुलन उनका मौलिक स्वभाव था।
मेहनत ही जीवन का उनका संसाधन था,
बदलती दुनिया से जैसे उनका अलगाव था।
पतझड़ के पीले पत्तों जैसा त्याग था,
बंजर धरती से भी असीम अनुराग था।
बेटी घर बसा ले, यही सतत ख्याल था,
अपने लिए तो बस दो रोटियों का सवाल था।
बेटा बड़ा हुआ, वैभव से दो-चार हुआ,
आत्मीयता के रथ पर जैसे आक्रमण सवार हुआ।
ममता की दुविधा में पिता बेबस हुआ,
आती-जाती पीढ़ियों के बीच
वह भी कहीं अकेला हुआ।
गौतम झा
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