पिघलती बर्फ़ – एक नज़्म

पिघलती बर्फ़ – एक नज़्म

जब हिमालय की बर्फ़ पिघलती है, तो केवल पहाड़ नहीं बदलते, जीवन की एक पूरी कहानी धीरे-धीरे बहने लगती है।

हिमालय की पिघलती बर्फ़

हिमालय की गोद में
एक उजली चुप्पी थी,
जहाँ बर्फ़ नींद की तरह
पहाड़ों पर ठहरी रहती थी।

अब वह चुप्पी भी पिघलती है।
धूप की नुकीली उँगलियाँ
छूती हैं उसके पुराने ज़ख़्म,
और बर्फ़
धीरे-धीरे आँसू बनकर ढल जाती है।

गंगा की गोद में उतरती है उसकी थकान,
जैसे माँ की हथेली पर
धीरे-धीरे बुझती
दीये की आख़िरी लौ।

पेड़ों के बीच से
एक ठंडी साँस गुजरती है,
शायद यह पहाड़ की
आख़िरी प्रार्थना है।

पत्थरों पर चमकती है नमी,
पर उसमें
ठंडक बची है,
कोई यक़ीन।

बस एक धुँधली-सी याद,
कि कभी यहाँ सर्दी रहती थी,
कभी बर्फ़ का होना
सिर्फ़ मौसम नहीं,
जीवन का दूसरा नाम था।

अब पहाड़ चुप है,
बर्फ़ पिघल रही है,
और उसकी हर बूँद
हमसे पूछ रही है
कि अगली पीढ़ी के लिए
क्या बचा रहेगा?

गौतम झा

 

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