कृष्ण विराट स्वरूप

कृष्ण विराट स्वरूप

कृष्ण विराट स्वरूप

सहस्र सिर नयनाभिराज, प्रचंड तेजस्वी वेग,
भँवरे कांपते, नभ थर्राए, जब प्रकट हुआ उनका महातेज़।

संसार सिमट गया, पृथ्वी झुकी, गगन नत हुआ,
सूर्य, चंद्र और तारक, उनके चरणों में बंधा हुआ।

भुजाओं में समुद्र, वज्र और गरुड़ की शक्ति बसा,
नाभि से निकलती रश्मि, नभ में फैलती अग्नि-धारा।

मुख से द्रव्य करुणामय, नयन से ब्रह्माण्ड की लहर,
अर्जुन कांप उठा, जब देखा उनका विराट स्वरूप।

रासलीला और विराट रूप का अद्भुत संगम,
प्रेम, शक्ति, भक्तिसृष्टि की अनुपम विहंगम।

मधुबन थर्रा उठा, पवन भी ठहर गया,
मुरली की बांसुरी गूँजी, हर कण आनंद में खिला।

सृष्टि की सीमा लांघे उनका दिव्य तांडव,
भय, मोह और माया की हर शक्ति हुई नतमस्तक

कृष्ण तांडव, विराट रूपसर्वशक्तिमान,
धर्म, प्रेम, भक्ति और शक्ति की अभिलक्षण महान।

-गौतम झा

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