काजल लगाने की परंपरा
नन्हीं आँखों में काजल की एक गहरी रेखा,
माँ के हाथों की ममता, दादी का स्नेह सहेजा।
कहते हैं नज़र से बचाता है ये काला टीका,
पर क्या सच में छुपा है इसमें कोई राज़ अजीब-सा?
गली-कूचों में हर बचपन यूँ ही सजाया जाता,
बेटों की पलकों पर भी काजल लगाया जाता।
परंपरा के धागों में बंधा है ये विश्वास,
सदियों से चला आ रहा, अनकहा-सा एहसास।
कभी ये रक्षा का प्रतीक, कभी प्यार की छाया,
कभी बस यूँ ही, बिना सोचे, सबने इसे अपनाया।
पर पूछे कोई, क्या सच में डर है उस नज़र का?
या ये बस आईना है हमारे भीतर के डर का?
बचपन तो मासूम है, न उसमें भेद न सीमा,
फिर क्यों लकीरों में बाँटें हम उसका नगीना?
काजल हो या कोई और रीति पुरानी,
समझना भी ज़रूरी है हर बात की कहानी।
नज़र की बातों में उलझे ये छोटे-छोटे सपने,
क्या सच में खतरा है, या बस डर हैं अपने?
आँखों की चमक को क्यों ढकें हम स्याही से,
जब उजाला ही पहचान है हर सच्ची निगाही से।
परंपरा का सम्मान हो, पर सोच भी नई हो,
हर रिवाज़ के पीछे समझ की रोशनी भी जली हो।
बचपन को आज़ादी दो, सवालों को उड़ान,
तभी तो बदलेगा कल, तभी बनेगा नया जहान।
चलो आज सोचें, परंपरा का अर्थ क्या है,
हर मान्यता के पीछे छुपा सच क्या है।
काजल की ये रेखा सिर्फ सजावट न बने,
बल्कि समझ और सवालों की भी एक राह बने।
— गौतम झा