जय महाकाल
ब्रह्मांड जिसके नेत्रों में,
भृकुटियों में काल हो,
देवों के तुम देव हो,
तुम्हीं तो महाकाल हो…
हलाहल जिसके कंठ में,
त्रिशूल जिसके हाथ हो,
ललाट पर जब चंद्र हो,
तुम्हीं तो कैलाशनाथ हो…
गंगा जिसकी जटाओं में,
वासुकी जिसके साथ हो,
नंदी पर जो सवार हो,
तुम्हीं तो पशुपतिनाथ हो…
निवास जिसका श्मशान में,
भस्म जिसका श्रृंगार हो,
डमरू की डमन्निनाद हो,
तुम्हीं तो नटराज हो…
बसे हो सबके मन में,
तुम वही ओंकार हो,
भोले भी, विक्राल भी,
तुम्हीं तो अंतकाल हो…
— गौतम झा
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