जय महाकाल

जय महाकाल

जिनकी भृकुटि में काल, जटाओं में गंगा और कंठ में हलाहल समाया है, उन महाकाल को समर्पित यह कविता भक्ति, शक्ति और अनंत चेतना का एक विनम्र प्रणाम है।

जय महाकाल

ब्रह्मांड जिसके नेत्रों में,
भृकुटि में समाया काल हो।
देवों के भी देव जो,
तुम्हीं तो महाकाल हो॥

हलाहल जिसके कंठ में,
त्रिशूल जिसके हाथ हो।
ललाट पर शोभित चंद्रमा,
तुम्हीं तो कैलाशनाथ हो॥

गंगा जिसकी जटाओं में,
वासुकी जिसका साथ हो।
नंदी पर जो विराजमान,
तुम्हीं तो पशुपतिनाथ हो॥

निवास जिसका श्मशान में,
भस्म जिसका श्रृंगार हो।
डमरू का गूँजता निनाद,
तुम्हीं तो नटराज हो॥

बसे हुए हो कण-कण में,
तुम ही पावन ओंकार हो।
भोले भी, विक्राल भी,
तुम्हीं सृष्टि का आधार हो॥

सृष्टि के आदि तुम ही हो,
तुम ही उसका विस्तार हो।
प्रलय की अंतिम साँस तक,
तुम्हीं तो अंतकाल हो॥

गौतम झा

 

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment

2 Comments

D
Dr.Barun Kumar Mishra
2 years ago
अत्यंत समसामयिक रचना
InsightfulTake Team
Thank you for sharing your thoughts. We appreciate your feedback and engagement with InsightfulTake.
P
Praveen Kumar Jha
2 years ago
विलक्षण 👌
InsightfulTake Team
Thank you for sharing your thoughts. We appreciate your feedback and engagement with InsightfulTake.