अनूठी खामोशी

अनूठी खामोशी

कुछ ख़ामोशियाँ शब्दों से अधिक गहरी होती हैं। वे न बोलती हैं, न सुनाई देती हैं, फिर भी मन के सबसे सूक्ष्म भावों को व्यक्त कर जाती हैं।

अनूठी ख़ामोशी

तुम्हारी ख़ामोशी अनूठी है,

जैसे किसी पोटली में कल्पनाएँ छिपी हों,
जैसे निशा और प्रभात के मध्य की बेला की अनुभूति हो,

जैसे अधरों पर ठहरी सिहरन का
अल्प-सा सम्प्रेषण हो।

जैसे अबोध आहट से सशंकित मन हो,
जैसे चंदन में लिपटे सर्प का मौन अभिनंदन हो।

जैसे भोर से पहले सूर्यमुखी का आतुरपन हो,
जैसे पर्याप्त वैभव में छिपा कोई अज्ञात छल हो।

तुम्हारी यह मूक दशा
कुछ ऐसी उपयुक्त, ऐसी उत्कृष्ट हो चली है,

मानो लोचनों के संयुक्त विमोचन से
कोई संयुक्ताक्षर शिल्प बन गया हो।

सविनय निवेदन की शुभ आकृति-सी,
यह मन-मस्तिष्क में
शबनम बनकर ठहर गई है।

गौतम झा

 

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment