पौष पूर्णिमा और बुद्ध
पौष की पूर्णिमा, शीतल चाँद की आभा,
इतिहास के मौन में बुद्ध-वाणी की प्रभा।
जैसे निरोध की ज्योति अँधियारा चीर जाए,
शिशिर की नीरवता में सत्य की दृष्टि खिल जाए।
गौतम शाक्यमुनि, राजस सुख से परे,
जीवन ने जब प्रश्न किया — “दुःख क्यों रहे?”
उन्होंने देखा — अनित्य है जग का स्वरूप,
दुःख का कारण तृष्णा, समाधान स्वयं के अनुरूप।
कर्म और इच्छा के बंधनों से ऊपर उठकर,
मध्यम मार्ग चुना — अतिवाद से हटकर।
ध्यान में स्थिर मन, विवेक से प्रकाशित,
निर्वाण वह अवस्था, जहाँ अहं हो विसर्जित।
पौष पूर्णिमा पर जैसे चेतना ठहरती है,
वैसे ही बुद्ध-वाणी भीतर उतरती है।
न आदेश, न भय, न दंड का विधान,
केवल अनुभव से उपजा करुणा का ज्ञान।
इतिहास ने जोड़ा दो सूत्र एक साथ —
पौष की पूर्णिमा और बुद्ध की बात।
संयम, समता और करुणा की सीख,
भारत की आत्मा में रची यह दृष्टि विशिष्ट।
मगध की भूमि से फैला यह आलोक,
अज्ञान के बंधनों में जगा विवेक का बोध।
गंगा की धार-सा शांत, पर गहन प्रभाव,
जहाँ संवाद बना संघर्ष का विकल्प अपार।
आज भी बुद्ध की वाणी क्यों गूंजती है?
क्यों हर युग में उसकी आवश्यकता बनती है?
क्योंकि दुःख आज भी रूप बदलकर आता है,
और मध्यम मार्ग ही मनुष्य को बचाता है।
शोध कहता — तृष्णा से मुक्त मन स्थिर होता है,
विज्ञान माने — ध्यान से मस्तिष्क रूपांतरित होता है।
जो भारत ने सहस्राब्दियों पहले जाना,
आज विश्व उसी सत्य को माना।
पौष पूर्णिमा केवल तिथि नहीं, स्मरण है,
कि उजाला बाहर नहीं, भीतर का चयन है।
जब अहं मौन होता है, करुणा बोलती है,
तभी बुद्ध भारत की चेतना में जीवित होती है।
— गौतम झा