क्या मृत्यु सच में अंत है, या हमारे भय से जन्मा एक भ्रम? “मृत्यु का भ्रम” जीवन, कर्म और अस्तित्व के उस रहस्य पर सवाल उठाती है, जिसका उत्तर शायद मृत्यु के पार छिपा है।
मृत्यु का भ्रम
मृत्यु का अगर डर नहीं होता,
पाप-पुण्य का भय नहीं होता।
काली रात में छुपा है काला साया,
पल भर में जीवन ने अंत को पाया।
जीवन दुःखों की अंतहीन माला है,
मृत्यु शायद उससे भी सरल प्याला है।
मृत्यु अंत है या कोई आरंभ है,
संसार में फैला यह कैसा भ्रम है।
सुख-दुःख से भरी जीवन एक नदी है,
इसके पार भी शायद कोई वैतरणी है।
मृत्यु का ज्ञान पंडितों में आम है,
कर्मकांड ही जिसका एकमात्र निदान है।
लौटकर तो कोई आता नहीं,
फिर मृत्यु से घबराता क्यों है?
जो होना है, वह होकर ही रहता है,
समय ही शायद जीवन का दंड कहता है।
मृत्यु से बड़ा भ्रम और क्या होगा,
जिसका भय जीवन से भी बड़ा होगा।
शायद अंत नहीं, एक नया पड़ाव है,
मृत्यु के पार ही कोई और ठहराव है।
गौतम झा
मृत्यु का भ्रम
मृत्यु का अगर डर नहीं होता,
पाप-पुण्य का भय नहीं होता।
काली रात में छुपा है काला साया,
पल भर में जीवन ने अंत को पाया।
जीवन दुःखों की अंतहीन माला है,
मृत्यु शायद उससे भी सरल प्याला है।
मृत्यु अंत है या कोई आरंभ है,
संसार में फैला यह कैसा भ्रम है।
सुख-दुःख से भरी जीवन एक नदी है,
इसके पार भी शायद कोई वैतरणी है।
मृत्यु का ज्ञान पंडितों में आम है,
कर्मकांड ही जिसका एकमात्र निदान है।
लौटकर तो कोई आता नहीं,
फिर मृत्यु से घबराता क्यों है?
जो होना है, वह होकर ही रहता है,
समय ही शायद जीवन का दंड कहता है।
मृत्यु से बड़ा भ्रम और क्या होगा,
जिसका भय जीवन से भी बड़ा होगा।
शायद अंत नहीं, एक नया पड़ाव है,
मृत्यु के पार ही कोई और ठहराव है।
गौतम झा
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