क्रांति-ज्योति
सत्यशोधक की सहचरी, अज्ञान-तम की भोर थी,
वो सिर्फ़ एक नारी नहीं, बदलाव की एक डोर थी।
अंधविश्वास की बेड़ियों में, जब जकड़ा सारा समाज था,
तब सावित्री की कलम का, उठा नया स्वर-साज था।
पहला कदम शिक्षा की ओर
भिड़े जब रूढ़िवादी, पत्थर और कीचड़ बरसाए,
पर वह डिगी न मार्ग से, साड़ी दूसरी साथ ले आए।
भीड़ में खोली पाठशाला, ज्ञान का दीप जला दिया,
अक्षर-शून्य उन आँखों को, स्वाभिमान सिखला दिया।
सामाजिक समानता का शंखनाद
सिर्फ़ किताबों तक नहीं, उनका संघर्ष महान था,
छुआछूत के दंश पर, वो करारा एक प्रहार था।
खोल दिए घर के हौज़, जब प्यास से कंठ जलते थे,
जाति-पाति के बंधन सब, उनके आगे पिघलते थे।
नारी गरिमा की रक्षक
विधवाओं के मुंडन रुकवाए, ‘नाई’ भी साथ आए थे,
निराश्रितों के दुख हरने को, बालहत्या-प्रतिबंधक गृह बनाए थे।
सत्यशोधक समाज की ज्योति, जन-जन तक पहुँचाई,
शोषितों और वंचितों की, वो बनी सशक्त परछाई।
अंतिम श्वास तक सेवा
जब प्लेग फैला नगर में, वो ममता का अवतार बनीं,
रोगी को काँधे पर ढोया, खुद ही उपचार बनीं।
अपने प्राणों की आहुति दे, मानवता को जिलाया,
इतिहास के हर पन्ने पर, अपना नाम अमर कराया।
-गौतम झा