दुर्बलता से युद्ध, आत्मबल की खोज और भक्ति से शक्ति तक की यह कविता मनुष्य को भीतर से मजबूत बनने का आह्वान करती है।
अनुकूल-अनुसरण
अर्थ, मान, यश गर पाना हो,
तब ठाकुर ही तुम्हारा ठिकाना हो।
सावधान हो जाओ, भक्त-सकल,
ठगे जाओगे सत्संग में आकर।
भारत की अवनति का आरंभ हुआ,
भौतिकता का जब प्रारंभ हुआ।
वाणिज्यवाद के जब तुम आसक्त हुए,
ऋषि छोड़कर रूढ़िवाद के भक्त हुए।
दुर्बलता से युद्ध लड़ना होगा,
साहसी और वीर तुम्हें बनना होगा।
निर्बलता से पाप पनपता है,
रक्त में अवसाद का ताप बढ़ता है।
परमपिता की संतान हो,
मौलिकता में प्रधान हो।
शक्ति का अनुसंधान करो,
धर्म पर ध्यान धरो।
मन-मुख जब एक नहीं होते,
पाप-पुण्य में भेद नहीं होते।
विफलता से घबराओ नहीं,
दुर्बलता को अपनाओ नहीं।
दुर्बल मन सशंकित है,
यह सत्य चिरकाल से अंकित है।
चेष्टा बार-बार करो,
विफलता पर प्रहार करो।
जीवन ज्वालामय है,
अंतर्मन में कलह है।
इंद्रियों को वश में करो,
प्रेम-शक्ति से विवश करो।
दुर्दशा, व्यथा, आशंका और अपराध,
दुर्बलताओं के ये चार कारण हैं।
सख्ती और शक्ति से इन्हें हटाना होगा,
सबल हृदय का दृष्टांत दिखाना होगा।
कामिनी-कांचन की आसक्ति जब हटती है,
भक्ति का रास-रंग मन में चढ़ती है।
श्रीश्री ठाकुर ने आगाह किया है,
भाव-भक्ति से अमृत का प्रवाह किया है।
गौतम झा
अनुकूल-अनुसरण
अर्थ, मान, यश गर पाना हो,
तब ठाकुर ही तुम्हारा ठिकाना हो।
सावधान हो जाओ, भक्त-सकल,
ठगे जाओगे सत्संग में आकर।
भारत की अवनति का आरंभ हुआ,
भौतिकता का जब प्रारंभ हुआ।
वाणिज्यवाद के जब तुम आसक्त हुए,
ऋषि छोड़कर रूढ़िवाद के भक्त हुए।
दुर्बलता से युद्ध लड़ना होगा,
साहसी और वीर तुम्हें बनना होगा।
निर्बलता से पाप पनपता है,
रक्त में अवसाद का ताप बढ़ता है।
परमपिता की संतान हो,
मौलिकता में प्रधान हो।
शक्ति का अनुसंधान करो,
धर्म पर ध्यान धरो।
मन-मुख जब एक नहीं होते,
पाप-पुण्य में भेद नहीं होते।
विफलता से घबराओ नहीं,
दुर्बलता को अपनाओ नहीं।
दुर्बल मन सशंकित है,
यह सत्य चिरकाल से अंकित है।
चेष्टा बार-बार करो,
विफलता पर प्रहार करो।
जीवन ज्वालामय है,
अंतर्मन में कलह है।
इंद्रियों को वश में करो,
प्रेम-शक्ति से विवश करो।
दुर्दशा, व्यथा, आशंका और अपराध,
दुर्बलताओं के ये चार कारण हैं।
सख्ती और शक्ति से इन्हें हटाना होगा,
सबल हृदय का दृष्टांत दिखाना होगा।
कामिनी-कांचन की आसक्ति जब हटती है,
भक्ति का रास-रंग मन में चढ़ती है।
श्रीश्री ठाकुर ने आगाह किया है,
भाव-भक्ति से अमृत का प्रवाह किया है।
गौतम झा
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