🔱 सावन का अंतिम सोमवार

🔱 सावन का अंतिम सोमवार

सावन के अंतिम सोमवार की इस पावन बेला में, जब घंटियों में गूँजता है महादेव का नाम और भक्तों की साँसों में बसता है शिव, तब यह कविता श्रद्धा, समर्पण और आत्मा के भीतर जागते महादेव का स्तुति-गान बन जाती है।

सावन का अंतिम सोमवार

कपाल-विभूषित भस्म-धारी,
त्रिनेत्र-ज्वाला, नाद-विहारी।
जब कांवर ले भक्त बढ़े,
मन हो जाए शिव-शिव गंगे॥

बेल-पत्र जब श्रद्धा बाँधे,
घंटनाद गगन को छू जाए।
मंत्रों से लहराए चेतन,
जटा-जूट से जाग्रत प्रांगण॥

कंठ में विष, करुणा-विभूषण,
डमरु में गूँजे ब्रह्म-संवेदन।
तांडव की लय से उठे कंपन,
हर अंगन में जगे आराधन॥

चंद्रशेखर, काल-विनाशक,
अंधकार में तेज-प्रकाशक।
सावन के इस अंतिम सोम में,
मन व्रती हो शिव-उपासक॥

त्रिशूल उठे, दिशाएँ काँपे,
जग बोले, “हर-हर महादेव।”
ब्रह्मांड थमे, नर्तन बोले,
भक्त हृदय में जगे महादेव॥

बिन कहे नयन, भाव बहा,
मन की गहराई में शिव उतरा
अंतिम सोम की संध्या में,
श्रद्धा दीपक-सा जल उठा॥

हे नीलकंठ, दिगंबर नाथ,
तेरे चरणों में ही प्राणपथ।
माँगूँ स्वर्ण, देवलोक,
बस नाम तेरा हो हर श्वास॥

श्रावण की इस सोम-वेला में,
मन बने नाद, देह तपोमय।
हर तांडव तुझमें थमे प्रभो,
हर साँस शिवमय, हर क्षण अमय॥

 - गौतम झा

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