रफा-दफा

रफा-दफा

कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, बस एक नज़र से रफ़ा-दफ़ा हो जाते हैं। यह कविता उसी अनकहे प्रेम, स्मृतियों और मौन स्वीकार की कहानी है।

रफ़ा-दफ़ा

दबी हुई आह की गिरफ़्त में हूँ मैं,
दीद की दहकती फ़ेहरिस्त में हो तुम।

क़हकहों की गूँज में, बेबस मुस्कान-सा चित्त है,
भूली हुई बातों का यूँ सहसा याद आना भी विचित्र है।

तुम्हारी आहट यूँ प्रतीत होती है,
मानो छाई धुंध पर सीत की बूँद टपकी हो।

तुम्हारे रुख़सार पर जो यह निखार आया है,
शायद उसमें मेरे असर का भी सौभाग्य समाया है।

मेरी बातों को बदल-बदल कर दोहराती हो,
शायद ऐसे ही तुम मुझे अपनाती हो।

चलते-चलते मेरे पार्श्व में ठिठक जाती हो,
क्या यही मेरे प्रति तुम्हारी मौन अभिव्यक्ति है?

'होने और होने' के इस द्वंद्व को अब विदा करो,
एक नज़र भर देखो, और सारी बातों को रफ़ा-दफ़ा करो।

गौतम झा

 

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