प्रकृति का स्वरूप

प्रकृति का स्वरूप

प्रकृति के कण-कण में छिपे अद्भुत स्वरूप से लेकर मानवता की उदासीनता तक, यह कविता उस सत्य की तलाश है जिसे हम देखते हुए भी अक्सर अनदेखा कर देते हैं।

प्रकृति का स्वरूप

प्रकृति का अपना स्वरूप है,
चल-अचल का अद्भुत रूप है।
एक सूरज है, जिसकी अनोखी धूप है,
जिससे खिलता जगत का हर रूप है।

ज़मीन से लगभग साठ मीटर ऊपर,
आशियाना-सा एक झोपड़ा,
पत्थर का होकर भी
अचरज-सा काम कर गया।

संगमरमर के बीच
बेहद बारीक-सी एक लकीर,
रिसते, पिसते और घिसते
बालू-कणों में रचती-बसती,
हरियाली का एक फ़क़ीर आया,
वहीं, जहाँ बुद्ध को यक़ीन आया,
बरगद का एक पौधा
बेहतरीन बनकर आया।

पत्थर में प्रकृति का स्वरूप है,
कण-कण में उसका अद्भुत रूप है।
कण-कण का भी भगवान होगा?
सरल-सुगम कोई नाम होगा?

पाप-पुण्य का विधान होगा,
कैसा उसका ब्रह्मधाम होगा?
भाषा के भी कई उपनाम होंगे,
संस्कृत में ही क्या परमधाम होगा?

मानवता को कहाँ यह ध्यान होगा?
मौलिकता की कोई पहचान होगा?
प्रायोजित विद्वानों का विज्ञान होगा,
चर्चा आम और प्रकृति अनजान होगा।

गौतम झा

 

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