रिश्ते बदलते हैं, संस्कार बिखरते हैं और इंसान खुद को ही खोने लगता है। यही है 'परेशान दुनिया' का दर्द।
परेशान दुनिया
अब मैं ख़ुद को ही ढूँढ़ने लगा हूँ,
खोया हुआ कल भूलने लगा हूँ।
कुछ निशानियाँ थीं अज़ीज़ मेरी,
उन्हीं को पढ़कर गुज़रने लगा हूँ।
जो सोचा, वह हुआ ही नहीं,
जो हुआ, उसे सहा ही नहीं।
कुछ तुम बदले, कुछ हम बदले,
फिर शुरू हुए तुम-तुम, हम-हम के मसले।
हिस्से में अब कहानियाँ आने लगीं,
किस्सों में कुरीतियाँ बसने लगीं।
मिल-जुलकर अपराध होने लगे,
संस्कार धीरे-धीरे खोने लगे।
जब दुश्मन ही दबंग हो,
और उसमें अपने ही अंग हों,
फिर किससे और कैसे रण हो,
जब अपना ही अपहरण हो।
गुमान को ही उत्थान मिला,
मर्यादा को न सम्मान मिला।
सुविधा का ही गुणगान है,
इसीलिए दुनिया परेशान है।
— गौतम झा
परेशान दुनिया
अब मैं ख़ुद को ही ढूँढ़ने लगा हूँ,
खोया हुआ कल भूलने लगा हूँ।
कुछ निशानियाँ थीं अज़ीज़ मेरी,
उन्हीं को पढ़कर गुज़रने लगा हूँ।
जो सोचा, वह हुआ ही नहीं,
जो हुआ, उसे सहा ही नहीं।
कुछ तुम बदले, कुछ हम बदले,
फिर शुरू हुए तुम-तुम, हम-हम के मसले।
हिस्से में अब कहानियाँ आने लगीं,
किस्सों में कुरीतियाँ बसने लगीं।
मिल-जुलकर अपराध होने लगे,
संस्कार धीरे-धीरे खोने लगे।
जब दुश्मन ही दबंग हो,
और उसमें अपने ही अंग हों,
फिर किससे और कैसे रण हो,
जब अपना ही अपहरण हो।
गुमान को ही उत्थान मिला,
मर्यादा को न सम्मान मिला।
सुविधा का ही गुणगान है,
इसीलिए दुनिया परेशान है।
— गौतम झा
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