मिथिला की नरक निवारण चतुर्दशी

मिथिला की नरक निवारण चतुर्दशी

नरक निवारण चतुर्दशी

माघ की ठिठुरन में जागी भोर,
मिथिला की गलियों में गूँजा शंख का शोर।
आज चतुर्दशी, नरक निवारण की पुकार,
संयम से खुलता मोक्ष का द्वार।

कहते हैं पुरखों के वचन पुराने,
इस तिथि से कटते कर्मों के ताने।
नरकासुर के अहं का हुआ था क्षय,
धर्म ने पाया था अपना विजय।

इसी स्मृति में यह दिन महान,
जब अधर्म पर धर्म हुआ बलवान।
नरक कोई लोक नहीं, यह बोध मिले,
वह भीतर बसता है—जब विवेक हिले।

मिथिला में आज उपवास कठोर,
जल भी नहीं, बस नाम का जोर।
दिन भर चलता आत्मा का मंथन,
शब्द नहीं, मौन करता है चिंतन।

न स्नान में शिथिलता, न मन में छल,
हर श्वास बनती है साधना का फल।
घर-घर दीप, तुलसी की छाया,
शुद्ध विचारों ने घर सजाया।

स्त्रियाँ गुनगुनाएँ व्रत की कथा,
नेत्रों में धैर्य, होठों पर प्रथा।
पुरुषों के मन में भी मौन विधान,
आज हर देह से बड़ा है आत्मज्ञान।

संध्या को जब चंद्र उदय हो,
लंबे उपवास का अंत तब हो।
फल-प्रसाद के रस का स्वाद,
मन में उतरता संशय का उन्माद।

भूख नहीं, तप का फल मिलता,
मन का बोझ स्वयं ही ढलता।
हल्का होता चित्त, शांत होती दृष्टि,
जैसे आत्मा ने पा ली नई सृष्टि।

नरक निवारण केवल तिथि नहीं,
यह जीवन को साधने की रीति सही।
जो आज जिया, वही कल बने राह,
मिथिला सिखाए—संयम ही चाह।

माघ की इस चतुर्दशी का उपहार,
करुणा, विवेक और आत्म-विचार।
जो व्रत करे, वह पाए यह ज्ञान—
नरक बाहर नहीं, भीतर है पहचान।

-गौतम झा

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment