मौनी अमावस्या: मौन, गंगा और आत्म-साधना

मौनी अमावस्या: मौन, गंगा और आत्म-साधना

मौनी अमावस्या

माघ मास की निस्तब्ध रजनी,
जब नभ में चंद्र दिखे, मौन छाए,
शब्द थककर शय्या लें,
और भाव स्वयं दीप जलाए।

मौनी अमावस्या का प्रभात,
वाणी से, नाद से जन्मे,
यह वह क्षण है जहाँ चेतना
अपने ही भीतर उतरकर थमे।

घाटों पर बैठी गंगा धारा,
बहते हुए भी उपदेश रचे,
कहेमौन ही वह सेतु है
जिस पर चित्त भव से बचे।

यह व्रत केवल अन्न का त्याग,
होंठों पर साधा मौन भर,
यह इंद्रियों की निवृत्ति है,
और मन का स्वाधीन स्वर।

जब भीतर का कोलाहल थमता,
और विचार भी लय पाते हैं,
तब मौन के गहन अंधकार में
अक्षर स्वयं प्रकाश बन जाते हैं।

प्राची से उगता सूर्य आज
धीमे-धीमे रथ बढ़ाता है,
मानो वह भी सीख रहा हो
कि मौन में ही अर्थ समाता है।

प्रयाग की रेती, तीर्थराज,
सहस्रों चरण चिह्न समेटे,
पर आज हर पग निश्चल है,
जैसे काल स्वयं सिमटे।

स्नान में केवल देह नहीं,
संदेह, द्वेष भी गल जाते हैं,
मौन-व्रती नयनों से
अश्रु भी मंत्र बन जाते हैं।

शास्त्र कहतेइस दिन का मौन
संस्कारों की गाँठ खोलता है,
जो सुन ले आत्मा की ध्वनि,
वही भव-सागर तोलता है।

उद्घोष, प्रतिवाद यहाँ,
जय-पराजय का व्यवहार,
मौनी अमावस्या सिखाती है
स्वयं से पहला संवाद-संस्कार।

संध्या ढले जब दीप जले,
और मौन हृदय में ठहर जाए,
लगता है भीतर का सत्य
आज स्वयं से साक्षात्कार कर जाए।

मौनी अमावस्याएक तिथि नहीं,
यह जीवन की भी एक रीति,
जहाँ शब्दों से आगे जाकर
मिलती है आत्मा की नीति।

Newsletter

Enter Name
Enter Email
Server Error!
Thank you for subscription.

Leave a Comment