क्यों

क्यों

जब मेहनत करने वाला ही अपने भविष्य को लेकर डरे, तो सवाल सिर्फ व्यक्ति से नहीं, पूरी व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।

क्यों?

खोने से ही कीमत का पता चलता है,
जागने से हर दिन नया सवेरा होता है।
पाने से सफलता भी मुस्कुराती है,
मेहनत से लोग फिर क्यों जी चुराते हैं?

परिश्रम ही तो जीवन का साथी है,
कोशिश ही हर मुश्किल को भाती है।
पाना-खोना सब जीवन का खेल है,
फिर मन में इतना डर क्यों पलता है?

पैसा, रुपया, दौलत और शोहरत,
क्या यही जीवन की पूरी जरूरत?
शिक्षा, दीक्षा, दया, दान और धर्म,
कौशल के आगे क्यों पड़ते हैं कम?

ज्ञान से जीवन में उजियारा है,
कर्म से ही हर सपना हमारा है।
फिर क्यों लालच मन पर भारी है,
क्यों इंसानियत आज बेचारी है?

आपस में बढ़ती अराजकता है,
शासक के हिस्से केवल वैभवता है।
विषय-वस्तु में बड़ी व्यापकता है,
जनता के मन में क्यों नीरसता है?

बेरोजगारी नदी-सी बहती जाती है,
युवा आँखों की नींद चुराती जाती है।
स्कूल और कॉलेज सवालों में जल रहे,
भविष्य के सपने धुएँ में पल रहे।

वस्तु, विज्ञान और व्यापार बदल रहा,
समय हर पल अपना आकार बदल रहा।
दुनिया आगे बढ़ती जा रही है,
सरकार की चाल क्यों ठहरती जा रही है?

क्यों मेहनत का मोल घटता जाता है?
क्यों हुनर पीछे छूटता जाता है?
क्यों शिक्षा रोजगार नहीं बन पाती?
क्यों उम्मीद दरवाजे से लौट जाती?

क्यों सवालों से आँख चुराते हैं?
क्यों सच से हम कतराते हैं?
जब बदलाव ही जीवन की रीत है,
फिर ठहराव की इतनी प्रीत क्यों है?

खोना है तो कुछ सीखकर खोएँ,
पाना है तो मेहनत से पाएँ।
डर को मन की दीवार बनने दें,
अपने सपनों को लाचार बनने दें।

दौलत आए तो अहंकार आए,
शोहरत आए तो संस्कार जाए।
ज्ञान मिले तो विनम्रता साथ रहे,
जीवन में इंसानियत की बात रहे।

यही सवाल है, यही पुकार है,
हर मन में आज यही विचार है।
दुनिया बदल रही है हर पल,
फिर हम क्यों नहीं बदलते कल?

गौतम झा

 

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