कुकुर और मानव

कुकुर और मानव

जब इंसान ही इंसान को नोचने लगे, तब सवाल सिर्फ़ कुत्तों के काटने का नहीं, हमारी इंसानियत के बचने का भी है।

कुकुर और मानव

प्रेम, करुणा और दया पर आपत्ति,
सुमति की नींद पर जागे कुमति।
नर हो, पशु हो या कोई जीव अपार,
इह गति हो या ऊह गति, हो सबकी सद्गति और उद्धार।

इंसान काट रहे इंसान को बेहिसाब,
इसकी बही-खाते का कौन दे हिसाब?
बेज़ुबानों पर लगाम कसना है तुम्हारे वश में,
पर इंसानों का क्या करोगे, सोचो ज़रा जवाब!

हम कोई हिमायती नहीं ऐसी वारदातों के,
कोई पिटारा शिकायतों और सवालातों के।
होनी को आज तक कौन टाल सका है, बताओ कोई,
कल मैं भी हो सकता हूँ शिकार इन ज़हरीले दाँतों का, सोचो कोई।

प्रेम, दया, परोपकार और क्षमा मानवता की निशानी,
इनसे ही लिखी जाती है इंसानियत की कहानी।
आँखों से बहने दो संवेदना बनकर पानी,
हर जीव की अपनी पीड़ा, अपनी ख़ुशी, अपनी कहानी।

हर हाल में इंसानियत कायम रहे, यही विनती है सबसे,
दुःख हो या दर्द, सुख हो या चैन, जीवन धड़कता है हर जीव में वैसे।
नर हो या पशु, सबमें जीवन का एक ही सार,
दया रहे दिल में तो दुनिया बने कुछ और बेहतर, कुछ और प्यार।

कवि कुमार 'प्रचंड'

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