कुछ पता नहीं
आवाज़ें कब शोर बन गईं, पता नहीं,
ख़ामोशी कब तन्हाई बन गई, पता नहीं।।
बेचैन-सा रहता है दिल अपनों के बीच,
मुस्कुराहट कब सज़ा बन गई, पता नहीं।।
रखा नहीं कभी ज़िंदगी का कोई हिसाब,
कर लिया वही, जिसमें दिल बेइंतहा लग गया।।
हौसलों की कमी कभी थी ही नहीं मुझमें,
मंज़िल कब छूट गई, पता ही नहीं।।
यूँ तो दोस्तों ने हमें अपना अज़ीज़ माना,
एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल ने भी अपना जाना।।
सोचा था ज़िंदगी अब रंगों से भर जाएगी,
कब बदतर हो गई, पता ही नहीं।।
– अंकित
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