ख़्वाब से हक़ीक़त तक, राख से आग तक और कहने से दहल जाने तक, “जमाना” बदलता भी है और बदल देता भी है।
जमाना
सपना ऐसा हो कि सजाने में जमाना लग जाए,
सच हो जाए तो सारे सितारे सिरहाने लग जाएँ।
जले, बुझे और फिर राख से फुदककर सुलग जाए,
फिर आग ऐसी लगे कि जमाना जलकर भुन जाए।
खिलौने, बचपन और दीवारें जब पुराने हो जाएँ,
तैयारी रखना, कहीं जमाना आमने-सामने न आ जाए।
तय कुछ नहीं है, तमन्नाओं का तराना गाओ,
सच्चा सुर लगे तो घरानों में जमाना बँट जाए।
रेख़्ता और हिंदवी, दोनों खुसरो ने उपजाई है,
इतनी-सी बात, आज तक समझ नहीं आई है।
कहना कह गया, सुनना सुनकर ठहर गया,
फिर ठहरकर जो कहा, जमाना दहल गया।
सितम हो तो ऐसा कि पोर-पोर में मरोड़ आ जाए,
जतन करो तो ऐसा कि जमाना भी विभोर हो जाए।
छोड़ो ऐसे कि छोर चारों ओर हो जाए,
पकड़ो ऐसे कि जमाना एक ओर हो जाए।
गौतम झा
जमाना
सपना ऐसा हो कि सजाने में जमाना लग जाए,
सच हो जाए तो सारे सितारे सिरहाने लग जाएँ।
जले, बुझे और फिर राख से फुदककर सुलग जाए,
फिर आग ऐसी लगे कि जमाना जलकर भुन जाए।
खिलौने, बचपन और दीवारें जब पुराने हो जाएँ,
तैयारी रखना, कहीं जमाना आमने-सामने न आ जाए।
तय कुछ नहीं है, तमन्नाओं का तराना गाओ,
सच्चा सुर लगे तो घरानों में जमाना बँट जाए।
रेख़्ता और हिंदवी, दोनों खुसरो ने उपजाई है,
इतनी-सी बात, आज तक समझ नहीं आई है।
कहना कह गया, सुनना सुनकर ठहर गया,
फिर ठहरकर जो कहा, जमाना दहल गया।
सितम हो तो ऐसा कि पोर-पोर में मरोड़ आ जाए,
जतन करो तो ऐसा कि जमाना भी विभोर हो जाए।
छोड़ो ऐसे कि छोर चारों ओर हो जाए,
पकड़ो ऐसे कि जमाना एक ओर हो जाए।
गौतम झा
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