जज्बातों का मरहम
लोग कहते हैं, वक़्त के साथ बदलना ज़रूरी है,
दूसरों के सामने अपनी कमज़ोरियाँ छिपाना भी ज़रूरी है।
कोई यह नहीं कहता कि दूसरों का सम्मान करो,
कम-से-कम कुछ अरमान तो ज़िंदा रखा करो।
कितने लोग राह में गिरे हुए को उठाते हैं,
ज़्यादातर तो उसे देखकर भी मुस्कुराते हैं।
छूटती जा रही है हमसे पीछे कहीं ज़िंदगी,
कभी अपने पैरों के निशान भी देखा करो।
ज़मीन कम पड़ गई, अब आसमान पर नज़र है,
मगर चाहतों की भूख का कहाँ कोई असर है।
वो कहता है, इंसानियत का दामन थामे रखना,
यदि भूल भी हो जाए, जज़्बातों पर मरहम रखना।
– अंकित
Leave a Comment