हिन्दी
चौदह सितम्बर को सजती हैं सभाएँ,
फीते कटते हैं, भाषणों की परछाइयाँ।
पोस्टरों पर लिखी जाती हैं जयकार,
"राजभाषा हमारी, हिन्दी प्यारी।"
पर कक्षाओं में, दफ्तरों की मेज़ों पर,
अंग्रेज़ी की चमक है हर पन्ने पर।
हिन्दी वहीँ कोने में खड़ी है उदास,
मानो अपनों के बीच ही दुल्हन बदहवास।
संविधान ने दी पहचान, गौरव का मान,
पर प्रयोग में क्यों है इतना अपमान?
लड़खड़ाते हैं शब्द, झिझकते हैं स्वर,
जब कोई लिखे हिन्दी का अंगार।
हर वर्ष मनाते हैं उत्सव, बाँटते मिठाई,
पर भाषा की प्रगति पर न कोई रौनक छाई।
सिर्फ़ औपचारिकता, भाषण और लेख,
क्या यही है उसका भविष्य, यही उसका देख?
हिन्दी को चाहिए कर्म, न कि रस्म,
क़लमों की धार, न कि भाषण का अंबार।
अनुवाद से आगे, शोध से परे,
सृजन की ज्योति जले, हर घर-आँगन भरे।
जब तक यह दिन रहेगा केवल प्रतीक,
भाषा की यात्रा होगी अधूरी और बदतरीन।
उत्सव की चकाचौंध से बाहर निकलें,
हिन्दी को जीवन की साँसों में पिघलाएँ।
-गौतम झा