गुलाबी-मौसम

गुलाबी-मौसम

जब झूठे वादों पर नवाबी खिलने लगे और सच की राह पर बर्बादी बिखरी हो, तब शब्द प्रतिरोध बन जाते हैं।

गुलाबी-मौसम

देश का मौसम अभी बड़ा गुलाबी है,
हर तरफ़ सपनों की सजी हुई नवाबी है।
झूठे वादों की कलियों पर खिलती शानो-शौकत जनाबी है,
सच की राह में बिखरी अब भी वही बर्बादी है।

जली माचिस की तीलियों पर रखी पनीली है,
आका की नज़र में ये पहेली बड़ी नशीली है।
धुएँ से लिखी तक़दीरों की अजब कहानी है,
राख के नीचे दबी हर उम्मीद पुरानी है।

भूख की धूप में भटकती मायूसी है,
बूढ़े बरगद पर छाई दया की उबासी है।
खाली थाली के स्वर में कैसी खामोशी है,
रोटी की तलाश में हर दिन नई बेहोशी है।

बाज़ारों में बिकती हर चेहरे की रवानी है,
सिक्कों से तौली जाती अब हर कहानी है।
सच का आईना कोनों में धूल से ढका पड़ा है,
झूठ की चौपाल पर उत्सवों का बड़ा घेरा है।

किरदार सभी पुराने हैं,
छाई बर्बादी की रानाई है।
मंच नए हैं, संवाद वही दोहराए जाते हैं,
चेहरे बदलते हैं मगर खेल पुराने निभाए जाते हैं।

नारों की नावों पर बहती हुई अगुवाई है,
वादों की खेती में उगती केवल सुनवाई है।
कल का सूरज लाने वाले आज भी खड़े हुए हैं,
लेकिन उनके हाथों में बीते मौसमों की कमाई है।

बदलाव की वैश्विक रवानी है,
भरोसे पर टिकी सारी कहानी है।
वक्त की नदी में बहते सपनों का कारवाँ है,
उम्मीदों के सहारे ही चलता हर इंसाँ है।

फिर भी इस गुलाबी मौसम का एक दूसरा पहलू है,
हर अँधेरे के पीछे कहीं उजाले का जुगनू है।
यदि सच की लौ बची रहे तो राह निकल आएगी,
बर्बादी की धूल से भी नई दुनिया बन जाएगी।

गौतम झा

 

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