एक मुश्किल

एक मुश्किल

जब हर राह उलझी लगे और खामोशी बोलने लगे, तब समझ आता है कि असली लड़ाई भीतर चल रही है।

एक मुश्किल

मेरे दरख़्त के शाखों पर,
पीले पत्तों के झुरमुट में,
अलसाया पंछी,
पैगाम--सुखन का मुंतजिर है।

साँसों में शिकन,
माथे पे सिलवट,
और खामोशी का हर्फ,
बताता है रात भारी थी।

अपने रकीबों के राजदाँ पर,
हैरतअंगेज परवाह है,
पेंच--खम का ख्याल
गुरबत से कहीं ऊपर है।

धुंधली सी सुबह की आहट में,
कुछ टूटी यादें जाग उठी हैं,
वक़्त के साए ठहर गए हैं,
और ख्वाहिशें फिर भाग उठी हैं।

थके कदमों की सरगोशी में,
बीते लम्हों का बोझ छुपा है,
हर इक मोड़ पे इक उलझन है,
हर रास्ता जैसे खुद से खफा है।

आँखों में इक अधूरी सी नींद,
दिल में अनकही सी बातें हैं,
कुछ ख्वाब धूल में सोए पड़े,
कुछ अब भी जागी रातें हैं।

फिर भी उम्मीद की एक किरण,
चुपके से दिल में उतरती है,
इस मुश्किल की धूप के पीछे,
शायद कोई छाँव ठहरती है।

मैं खुद से यही सवाल करूँ,
क्या हार ही मेरा मुकद्दर है?
या इस अंधेरे के उस पार कहीं,
रोशनी का भी एक सफ़र है।

मेरे दरख़्त के शाखों पर,
अब भी वो पंछी बैठा है,
थोड़ा थका, थोड़ा खामोश,
पर फिर भी कुछ कहने बैठा है।।

गौतम झा

 

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