एक ही बात

एक ही बात

जब मन के हर कोने में केवल एक ही नाम, एक ही स्मृति और एक ही एहसास रह जाए, तब जन्म लेती है ऐसी कविता। "एक ही बात" प्रेम की उसी अविरल अनुभूति का स्वर है।

एक ही बात

दिन-रात एक ही बात,
रग-रग में है आपका उत्पात।

क्षण-क्षण का यह प्रादुर्भाव,
अंतर्मन में बस आपका अभाव।

आपके ज्ञात के प्रतिकूल,
फिर भी सब कुछ है अनुकूल।

सापेक्ष नहीं यह परिप्रेक्ष्य,
पर अपूर्व हैं सारे संवेग।

स्तब्ध रजनी-सा शांत चितवन,
मानसरोवर-सा एकांत प्रेमिमन।

चल-अचल सब हैं बेकल,
शशि-आलोक में रोता है एकल।

मेरु-शिखर-सा आपका लगाव,
धधकती अग्नि-सा इसका प्रभाव।

अनुशीलित अनुराग-सा सुंदर स्वभाव,
सुमन-सुगंधित मनोहर भाव।

गौतम झा

 

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