उम्र बढ़ती जाती है, दोस्त दूर होते जाते हैं, लेकिन सच्ची दोस्ती अक्सर ख़ामोशी में और गहरी होती जाती है।
दोस्ती की ख़ामोश रोशनी
जब उम्र बढ़ती है, पर दोस्ती वहीं ठहर जाती है
अब दोस्ती वैसी नहीं रही।
न स्कूल की छुट्टियों वाला वह हुल्लड़ है,
न कॉलेज की छत पर बैठकर सपनों की लंबी बैठक।
अब ज़िंदगी चुपचाप बहती रहती है
बचपन के उन ठिकानों से,
जहाँ दोस्त सिर्फ़ साथ नहीं होते थे,
बल्कि वही तो हमारी पूरी दुनिया हुआ करते थे।
अब हम सब बड़े हो चुके हैं।
रोज़गार, परिवार, जिम्मेदारियों और थकान की गठरी उठाए
ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती जाती है।
फिर भी, कभी-कभी कोई पुराना नाम अचानक उभर आता है।
फोनबुक में, किसी तस्वीर में,
या दिल की किसी ऐसी बंद पड़ी दराज़ में
जिसे हमने बरसों से खोला तक नहीं।
कभी अचानक फ़ोन आता है।
"अबे, ज़िंदा है?"
और बस इतनी सी बात
वक़्त की बरसों पुरानी दीवारों को गिरा देती है।
फिर लगता है,
हम दूर कहाँ हुए थे?
बस ज़िंदगी थोड़ी व्यस्त हो गई थी।
अब दोस्ती को शोर की ज़रूरत नहीं होती।
वह ख़ामोशी में भी अपना हाथ थामे रहती है।
न कोई हिसाब,
न कोई शिकायत,
न कोई बड़ा वादा।
बस एक भरोसा रहता है
कि जब दुनिया की सारी आवाज़ें थम जाएँ,
तब भी कहीं से एक आवाज़ आएगी।
"मैं यहीं हूँ।
तूने कहा नहीं,
लेकिन मैं समझ गया।"
शायद यही उम्र के साथ बदलती दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात है।
अब दोस्त वह नहीं
जो हर रोज़ तुम्हारे साथ हो।
दोस्त वह है
जो तुम्हारे शब्दों से पहले तुम्हारे मन को पढ़ ले,
जो अपनी व्यस्त दुनिया में भी
तुम्हारे अकेलेपन की दस्तक सुन ले।
अब दोस्ती कोई त्योहार नहीं,
जिसे साल में एक दिन मनाया जाए।
वह तो एक अदृश्य संबल है,
जो हमें भीतर से उन दिनों से जोड़े रखता है
जब हम दुनिया से कम
और ख़ुद से ज़्यादा परिचित थे।
इस मित्रता दिवस पर
उन सभी दोस्तों को सलाम,
जिनसे महीनों बात नहीं होती,
कभी-कभी वर्षों तक मुलाक़ात नहीं होती,
फिर भी जिनकी याद
चाय की हर चुस्की में घुली मिलती है।
उन दोस्तों को भी,
जिनका नाम याद आते ही
चेहरे पर अनायास मुस्कान आ जाती है।
और उन दोस्तों को भी,
जिनसे ज़िंदगी ने दूर कर दिया,
लेकिन दिल ने कभी नहीं।
क्योंकि सच्ची दोस्ती साथ रहने का नाम नहीं है।
यह उस भरोसे का नाम है
जो दूरी के बावजूद बना रहता है।
मित्रता अब कहानियों में नहीं, ख़ामोशियों में ज़िंदा है।
– गौतम झा
दोस्ती की ख़ामोश रोशनी
जब उम्र बढ़ती है, पर दोस्ती वहीं ठहर जाती है
अब दोस्ती वैसी नहीं रही।
न स्कूल की छुट्टियों वाला वह हुल्लड़ है,
न कॉलेज की छत पर बैठकर सपनों की लंबी बैठक।
अब ज़िंदगी चुपचाप बहती रहती है
बचपन के उन ठिकानों से,
जहाँ दोस्त सिर्फ़ साथ नहीं होते थे,
बल्कि वही तो हमारी पूरी दुनिया हुआ करते थे।
अब हम सब बड़े हो चुके हैं।
रोज़गार, परिवार, जिम्मेदारियों और थकान की गठरी उठाए
ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती जाती है।
फिर भी, कभी-कभी कोई पुराना नाम अचानक उभर आता है।
फोनबुक में, किसी तस्वीर में,
या दिल की किसी ऐसी बंद पड़ी दराज़ में
जिसे हमने बरसों से खोला तक नहीं।
कभी अचानक फ़ोन आता है।
"अबे, ज़िंदा है?"
और बस इतनी सी बात
वक़्त की बरसों पुरानी दीवारों को गिरा देती है।
फिर लगता है,
हम दूर कहाँ हुए थे?
बस ज़िंदगी थोड़ी व्यस्त हो गई थी।
अब दोस्ती को शोर की ज़रूरत नहीं होती।
वह ख़ामोशी में भी अपना हाथ थामे रहती है।
न कोई हिसाब,
न कोई शिकायत,
न कोई बड़ा वादा।
बस एक भरोसा रहता है
कि जब दुनिया की सारी आवाज़ें थम जाएँ,
तब भी कहीं से एक आवाज़ आएगी।
"मैं यहीं हूँ।
तूने कहा नहीं,
लेकिन मैं समझ गया।"
शायद यही उम्र के साथ बदलती दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात है।
अब दोस्त वह नहीं
जो हर रोज़ तुम्हारे साथ हो।
दोस्त वह है
जो तुम्हारे शब्दों से पहले तुम्हारे मन को पढ़ ले,
जो अपनी व्यस्त दुनिया में भी
तुम्हारे अकेलेपन की दस्तक सुन ले।
अब दोस्ती कोई त्योहार नहीं,
जिसे साल में एक दिन मनाया जाए।
वह तो एक अदृश्य संबल है,
जो हमें भीतर से उन दिनों से जोड़े रखता है
जब हम दुनिया से कम
और ख़ुद से ज़्यादा परिचित थे।
इस मित्रता दिवस पर
उन सभी दोस्तों को सलाम,
जिनसे महीनों बात नहीं होती,
कभी-कभी वर्षों तक मुलाक़ात नहीं होती,
फिर भी जिनकी याद
चाय की हर चुस्की में घुली मिलती है।
उन दोस्तों को भी,
जिनका नाम याद आते ही
चेहरे पर अनायास मुस्कान आ जाती है।
और उन दोस्तों को भी,
जिनसे ज़िंदगी ने दूर कर दिया,
लेकिन दिल ने कभी नहीं।
क्योंकि सच्ची दोस्ती साथ रहने का नाम नहीं है।
यह उस भरोसे का नाम है
जो दूरी के बावजूद बना रहता है।
मित्रता अब कहानियों में नहीं, ख़ामोशियों में ज़िंदा है।
– गौतम झा
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