दिन नीलाम

दिन नीलाम

कुछ चीज़ें कभी हमारी नहीं होतीं, फिर भी हम उन्हें अपनी ज़िंदगी का सबसे अनमोल हिस्सा बनाए रखते हैं। "दिन नीलाम" उसी प्रतीक्षा, उसी अधूरे वादे और उसी अनकहे प्रेम की कविता है, जिसकी कीमत समय के साथ और बढ़ती चली जाती है।

दिन नीलाम

मेरे ख़्वाबों के अलाव जल रहे हैं,
और किसी ने उन्हें देखा ही नहीं।

उसकी स्मृतियाँ भले ही मुट्ठी-भर हों,
इन्हीं में जग की सारी मिल्कियत पिरोई हुई है।

चाँदनी रात-सा वह दिलकश नज़ारा,
मानो ज़िंदगी गुज़ारने का अंतिम सहारा।

धूप, बारिश, सर्दी और तूफ़ान,
सब आए जैसे किसी दूर देश के सलाम।

बस एक शाम वह ठहर जाए,
जैसे खुली छत से अचानक सुबह उतर आए।

रूह थक चुकी है इंतज़ार करते-करते,
वक़्त भी अब सवाल करने लगा है ठहरते-ठहरते।

जो मिला नहीं, उसी की क़ीमत बढ़ती गई,
हर बीतते पल के साथ बोली चढ़ती गई।

दिल के इसी अहद के वास्ते,
मैंने अपनादिननीलाम रखा है।

गौतम झा

 

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