दिल्ली अभी दूर है

दिल्ली अभी दूर है

दिल्ली सिर्फ़ एक शहर नहीं, सत्ता तक पहुँचने की सबसे कठिन यात्रा का प्रतीक भी है। यह कविता उसी दूरी, विडंबना और व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य करती है।

दिल्ली अभी दूर है

दिल्ली अभी दूर है, औलिया इसी से मशहूर है,
मध्यकाल का जुमला था, आज भी वही मामला है।

ऊपर से सब दिखता है, नीचे क्या रुकता है?
ज़मीन चलती रहती है, आसमान कहाँ झुकता है?

करार हरजाई है, कई दफ़ा आज़माई है,
फ़िक्र तो जम्हाई है, नींद ही इसकी दवाई है।

मिलना अगर मुक़द्दर है, तंगदिल क्यों मुक़र्रर है?
ढंग-ढंग के लोग यहाँ, बेढंग ही सबसे बड़ा रोग यहाँ।

गुमान में मान कहाँ, सरहद पर आराम कहाँ?
जब दिन ही मलीन हो, तक़दीर बेहतरीन कहाँ?

धरती पर यक़ीन है, किस्सा भी हसीन है,
दुविधा में वक़ार है, सुविधाओं के भी कई प्रकार हैं।

सरल स्वभाव हो, आर्थिक अभाव हो,
बात चाहे कुछ भी हो, तुम ही सबसे बेकार हो।

उड़ता पंजाब हो, निखरता बिहार हो, या दिल्ली की सरकार हो,
सबका एक ही राज़ है, शराब से चलता हर कारोबार हो।

मणिपुर की अपनी महिमा है, सरकार भी अपनी गरिमा में है,
रक्तरंजित आँगन, गर्म अख़बार हैं, फलाँ-ठिकानों पर सजे बाज़ार हैं।

गौतम झा

 

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