जब शब्द थक जाते हैं, तब चुप्पी बोलती है। यह कविता उसी खामोशी की कहानी है, जो बाहर से शांत दिखती है, पर भीतर अनगिनत विचारों और भावनाओं का संसार समेटे रहती है।
चुप्पी…
चुप्पी…
चुप्पी अच्छी है।
अल्प है, फिर भी विशेष है,
स्वयं में एक संदेश है।
कुछ क्षणों का अवशेष है,
निराधार नहीं इसका वेश है।
चुभती है,
चिल्लाती है,
पर कुछ बताती नहीं।
गंभीरता का आलम है,
लेकिन मन का बालम है।
शब्दों का यह अंत है,
पर विचारों का अनंत है।
पतझड़-सी इस ख़ामोशी में,
छिपा हुआ एक वसंत है।
यह अनकहा-सा राग है,
भीतर सुलगती आग है।
सफ़ेद कोरी चादर पर,
अमिट पड़ा वह दाग है।
शोर के पीछे भागती
दुनिया सोती—यह जागती।
सत्य के निर्मल दर्पण से,
परछाईं भी नहीं भागती।
थकान का यह नाम है,
पर रूह का विश्राम है।
भीड़ में जो खो गया,
उसका यही तो धाम है।
जब शब्द सभी थक जाते हैं,
भाव स्वयं मुखर हो जाते हैं।
चुप्पी के इस गहरे सागर में,
कितने उत्तर उतर आते हैं।
— गौतम झा
चुप्पी…
चुप्पी…
चुप्पी अच्छी है।
अल्प है, फिर भी विशेष है,
स्वयं में एक संदेश है।
कुछ क्षणों का अवशेष है,
निराधार नहीं इसका वेश है।
चुभती है,
चिल्लाती है,
पर कुछ बताती नहीं।
गंभीरता का आलम है,
लेकिन मन का बालम है।
शब्दों का यह अंत है,
पर विचारों का अनंत है।
पतझड़-सी इस ख़ामोशी में,
छिपा हुआ एक वसंत है।
यह अनकहा-सा राग है,
भीतर सुलगती आग है।
सफ़ेद कोरी चादर पर,
अमिट पड़ा वह दाग है।
शोर के पीछे भागती
दुनिया सोती—यह जागती।
सत्य के निर्मल दर्पण से,
परछाईं भी नहीं भागती।
थकान का यह नाम है,
पर रूह का विश्राम है।
भीड़ में जो खो गया,
उसका यही तो धाम है।
जब शब्द सभी थक जाते हैं,
भाव स्वयं मुखर हो जाते हैं।
चुप्पी के इस गहरे सागर में,
कितने उत्तर उतर आते हैं।
— गौतम झा
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