चाँद में गड्ढा

चाँद में गड्ढा

चाँद का गड्ढा केवल भूगोल नहीं, वह उस अदृश्य दर्जी का कार्यस्थल है जो पूरी दुनिया की रोशनी सीती है, लेकिन स्वयं अँधेरे में जीती है।

चाँद में गड्ढा

रजनी के चाँद की धरा को निहारा,
तो पाया,
उजालों के विराट नगर में भी
अँधेरे का एक गहरा गड्ढा है।

आलोक के विराट वृक्ष की छाया तले
एक सांवली-सी खाई चुपचाप पसरी है,
मानो प्रकाश ने
अपने ही भीतर
एक रहस्य छिपा रखा हो।

सुना है,
उस खाई की निस्तब्ध गोद में
एक उदास, अकेली
बूढ़ी दर्जी रहती है।
उसके चेहरे की झुर्रियों में
समय के असंख्य ग्रहण दर्ज हैं,
और उसकी आँखों में
अनगिनत बुझ चुके सितारों की थकान।

वह चाँदनी के महीन धागों से
रात की फटी चादर सीती है।
आकाशगंगा के समस्त सितारे,
ध्रुव से लेकर टूटते तारों तक,
यहीं आकर
अपने उजाले की सिलाई करवाते हैं।

सूरज की किरणें भी
कभी-कभी चुपके से
अपनी उधड़ी सुनहरी किनारियाँ
उसी के हाथों सँवरवाती हैं।
वह बिना किसी शिकायत के
सबकी रोशनी बचाती रहती है,
पर उसका अपना घर
सदैव अँधेरे में डूबा रहता है।

इसीलिए
कभी-कभी अँधेरे की छोटी-छोटी पट्टियाँ
उजाले के शाही परिधानों पर
सिलाई की तरह दिखाई देती हैं।
वे कोई दोष नहीं,
उस बूढ़ी दर्जी की मेहनत के
अनकहे हस्ताक्षर हैं।

पर व्यापार को
कब किसी दर्जी की उँगलियों के घाव दिखते हैं?
उसे तो केवल
चमकता हुआ वस्त्र चाहिए।

और सरकार को भी
यही दृश्य सबसे अधिक भाता है,
कि रोशनी बिकती रहे,
अँधेरा बस
किसी गड्ढे में छिपा रहे।

गौतम झा

 

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