कभी-कभी प्रेम किसी व्यक्ति से नहीं, उसके बनाए हुए भ्रमजाल से हो जाता है।
भ्रमजाल
हजार बोतलों का हिसाब, तुम्हारी नज़रों की धार में है,
खुल्द बेहाल है, तुम्हारे जमाल की मिसाल पर सवाल है।
एक पल का कहर अगर इधर हो जाए,
एक सदी का लुत्फ़ सिमटकर बसर हो जाए।
अब जाना कि आदम कैसे गुनाहगार हुआ,
तेरे लम्स का जादू था कि वो बेकरार हुआ।
तू मुमकिन हो, ऐसा मेरे भ्रम का ख़्वाब है,
जैसे चाँदनी रात में गुलाब की टहनी पर खड़ा ताज है।
तेरी एक झलक में मौसमों का असर समाया है,
सूखी हुई रूह को भी तूने दरिया-सा बहाया है।
तेरी ख़ामोशी में अनकहे किस्सों का शोर है,
हर लफ़्ज़ तेरे आगे जैसे अपना अर्थ खोने को मजबूर है।
मैंने चाहा था तुझे सच की तरह समझना,
पर तू तो हर बार एक नया रहस्य बनकर उभरी।
कभी धूप की तरह पलकों पर उतर आती है,
कभी बादल बनकर आँखों से गुजर जाती है।
तेरे चेहरे की रौशनी में ऐसी तासीर है,
कि अँधेरों को भी अपने होने पर शर्मिंदगी महसूस होती है।
तेरे क़दमों की आहट से राहें महक उठती हैं,
और वीरानियों में भी उम्मीदें चहक उठती हैं।
न जाने कैसी तिलिस्मी कारीगरी है तेरे वजूद में,
कि हर दूरी भी तेरे क़रीब होने का एहसास देती है।
मैंने कई दफ़ा दिल को समझाया कि यह वहम है,
मगर हर दलील के बाद तेरा होना और भी मुकम्मल लगा है।
तेरी आँखों में झाँककर समय ठहर-सा जाता है,
जैसे कोई सदियों पुराना सपना फिर से लौट आता है।
तू हक़ीक़त है या कल्पना की कोई परछाई,
इस सवाल ने ही मेरी रातों की नींद चुराई।
तेरे होने का यक़ीन भी है, इंकार भी है,
यह दिल तेरे इश्क़ का तलबगार भी है, बीमार भी है।
कभी लगता है तू बस हवा का एक झोंका है,
जिसे पकड़ने की कोशिश में हर एहसास धोखा है।
फिर लगता है तू वही मुकाम है जिसकी तलाश थी,
मेरी अधूरी दुआओँ में जो बरसों से बस एक आस थी।
तेरे ख़यालों का जाल इतना गहरा, इतना विशाल है,
कि उससे निकलने की हर कोशिश भी बेमिसाल है।
शायद यही इश्क़ का सबसे पुराना सवाल है,
जहाँ सच कम और दिल का भ्रमजाल है।
और मैं आज भी उसी भ्रम के उजाले में खड़ा हूँ,
तेरे होने और न होने के दरमियान अड़ा हूँ।
न जाने यह मोहब्बत है, इबादत है या कोई खुमार है,
बस इतना जानता हूँ कि मेरा हर विचार तेरा उधार है।
हजार बोतलों का हिसाब अब भी तुम्हारी नज़रों की धार में है,
और मेरी पूरी दुनिया आज भी तेरे भ्रमजाल में है।
— गौतम झा
भ्रमजाल
हजार बोतलों का हिसाब, तुम्हारी नज़रों की धार में है,
खुल्द बेहाल है, तुम्हारे जमाल की मिसाल पर सवाल है।
एक पल का कहर अगर इधर हो जाए,
एक सदी का लुत्फ़ सिमटकर बसर हो जाए।
अब जाना कि आदम कैसे गुनाहगार हुआ,
तेरे लम्स का जादू था कि वो बेकरार हुआ।
तू मुमकिन हो, ऐसा मेरे भ्रम का ख़्वाब है,
जैसे चाँदनी रात में गुलाब की टहनी पर खड़ा ताज है।
तेरी एक झलक में मौसमों का असर समाया है,
सूखी हुई रूह को भी तूने दरिया-सा बहाया है।
तेरी ख़ामोशी में अनकहे किस्सों का शोर है,
हर लफ़्ज़ तेरे आगे जैसे अपना अर्थ खोने को मजबूर है।
मैंने चाहा था तुझे सच की तरह समझना,
पर तू तो हर बार एक नया रहस्य बनकर उभरी।
कभी धूप की तरह पलकों पर उतर आती है,
कभी बादल बनकर आँखों से गुजर जाती है।
तेरे चेहरे की रौशनी में ऐसी तासीर है,
कि अँधेरों को भी अपने होने पर शर्मिंदगी महसूस होती है।
तेरे क़दमों की आहट से राहें महक उठती हैं,
और वीरानियों में भी उम्मीदें चहक उठती हैं।
न जाने कैसी तिलिस्मी कारीगरी है तेरे वजूद में,
कि हर दूरी भी तेरे क़रीब होने का एहसास देती है।
मैंने कई दफ़ा दिल को समझाया कि यह वहम है,
मगर हर दलील के बाद तेरा होना और भी मुकम्मल लगा है।
तेरी आँखों में झाँककर समय ठहर-सा जाता है,
जैसे कोई सदियों पुराना सपना फिर से लौट आता है।
तू हक़ीक़त है या कल्पना की कोई परछाई,
इस सवाल ने ही मेरी रातों की नींद चुराई।
तेरे होने का यक़ीन भी है, इंकार भी है,
यह दिल तेरे इश्क़ का तलबगार भी है, बीमार भी है।
कभी लगता है तू बस हवा का एक झोंका है,
जिसे पकड़ने की कोशिश में हर एहसास धोखा है।
फिर लगता है तू वही मुकाम है जिसकी तलाश थी,
मेरी अधूरी दुआओँ में जो बरसों से बस एक आस थी।
तेरे ख़यालों का जाल इतना गहरा, इतना विशाल है,
कि उससे निकलने की हर कोशिश भी बेमिसाल है।
शायद यही इश्क़ का सबसे पुराना सवाल है,
जहाँ सच कम और दिल का भ्रमजाल है।
और मैं आज भी उसी भ्रम के उजाले में खड़ा हूँ,
तेरे होने और न होने के दरमियान अड़ा हूँ।
न जाने यह मोहब्बत है, इबादत है या कोई खुमार है,
बस इतना जानता हूँ कि मेरा हर विचार तेरा उधार है।
हजार बोतलों का हिसाब अब भी तुम्हारी नज़रों की धार में है,
और मेरी पूरी दुनिया आज भी तेरे भ्रमजाल में है।
— गौतम झा
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