बातों-बातों में
नशे की बात हो,
और ज़िक्र चाय का न हो—
संगीन है।
फूलों का बगीचा हो,
और खुशबू गायब हो—
रहस्यमय है।
रात गहरी हो,
और बात तुम्हारी न हो—
अकेलापन है।
संबंध पर विचार हो,
और लगाव का अभाव हो—
अलगाव है।
संघर्ष भरा जीवन हो,
और पाने की चाह न हो—
निरर्थक है।
राज्य का संचालन हो,
और निष्ठा में स्पष्टता न हो—
कूटनीति है।
सवाल अधिकार का हो,
और बुनियादी संवेदना न हो—
आंदोलन है।
धर्म की राग हो,
और सहिष्णुता का अनुदान न हो—
धर्मान्ध है।
हम लिखें,
और आप पढ़ें नहीं—
ग़मगीन नज़रअंदाज़ है।
— गौतम झा
Pankaj Kumar
1 year agoYe toh gajab ka hai
Gunja
1 year agoAwesome!