अस्मिता 'मैं' का

अस्मिता 'मैं' का

जब 'मैं' का अहंकार पिघलकर 'हम' में बदलता है, तभी अस्मिता अपने वास्तविक अर्थ और मनुष्यता की सर्वोच्च गरिमा को प्राप्त करती है।

अस्मिता 'मैं' का

अस्मिता 'मैं' का, विमर्श में तय होने लगा,
किरदार किसी का, कहानी किसी की, समीक्षा में मूल्य होने लगा।
सत्य कहीं मौन खड़ा है, शब्दों का शोर मुखर होने लगा,
चेहरों के इस मेले में, मनुष्य स्वयं से दूर होने लगा।।

संसाधनों से सुविधा का विस्तार सर्वव्याप्त है,
पर अभाव से बना श्रीराम सेतु क्यों आज भी अज्ञात है।
वैभव की ऊँची दीवारों पर उपलब्धियों का अभिमान लिखा है,
त्याग और तप की नींव पर खड़ा इतिहास फिर भी अनाम रहा है।।

लघु के बिना दीर्घ का क्या अस्तित्व, क्या औकात है?
बूँदों से ही सागर, कणों से ही पर्वत की बात है।
जो स्वयं को छोटा समझे, वही विराट का द्वार खोलता है,
सहजता में ही मर्यादा का सम्पूर्ण विस्तार होता है।।

वीरता केवल रणभूमि की गर्जना का नाम नहीं,
धैर्य से बढ़कर जीवन में कोई और आयाम नहीं।
जो क्रोध पर विजय पाए, वही सच्चा बलवान है,
सम्मान विनम्रता से जन्मता है, अहंकार से नहीं पहचान है।।

विश्वास ही धर्म का प्रथम और अंतिम आधार है,
सौहार्द, करुणा और प्रेम से ही उसका विस्तार है।
मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा केवल प्रतीक हैं,
मनुष्यता से रिक्त हृदय में सभी उपासना संगीतहीन हैं।।

कण-कण में ईश्वर है, यह सृष्टि उसी का विस्तार है,
फिर निर्जीव क्यों नश्वर है, यह भी प्रकृति का व्यवहार है।
जो मिटता है, वही नए सृजन का आधार बन जाता है,
अंत ही आरंभ का पहला संकेत कहलाता है।।

आत्मा परमात्मा की ही एक ज्योति, एक इकाई है,
फिर धर्मात्मा होने की इतनी ऊँची दुहाई क्यों भाई है?
जब प्रत्येक प्राणी में वही चेतना समाई है,
तो भेदभाव की यह दीवार किसने और क्यों बनाई है।।

'मैं' जब 'हम' में ढल जाता है, तभी जीवन सार्थक होता है,
अहं का दीप बुझते ही अंतर्मन आलोकित होता है।
अस्मिता अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व का परिचय बने,
मनुष्य मनुष्य रहे, बस इतना ही जीवन का विजयगान बने।।

- गौतम झा

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment