#अरावली
अरावली कोई पत्थर नहीं है
जो मशीनों के शोर से डर जाए,
न कोई बंजर ज़मीन
जिसे फ़ाइलों के बीच दफना दिया जाए।
वह समय की रीढ़ है—
भारत की साँसों की पहली लकीर।
यही वह पर्वत है
जिसने थार को आगे बढ़ने से रोका,
हवाओं को दिशा दी,
बारिश को थामा,
और शहरों को
रेगिस्तान बनने से बचाया।
यह सिर्फ़ पहाड़ नहीं—
यह जलभृत है,
भूजल की अदृश्य तिजोरी,
जैव विविधता की गोद,
तापमान की ढाल,
और दिल्ली–एनसीआर की
अनकही सुरक्षा रेखा।
आज उसी अरावली के सीने पर
कानूनी अनुमतियों की मोहर है,
उद्योगों को हरी झंडी है,
खदानों की भूख है—
और सवाल यह नहीं कि
क्या यह वैध है,
सवाल यह है—
क्या यह न्यायसंगत है?
विडंबना देखिए—
भारत जलवायु परिवर्तन पर
दुनिया को उपदेश देता है,
सम्मेलन करता है,
घोषणाएँ करता है,
दिल्ली में तालियाँ बजती हैं,
और अरावली में
पेड़ों की चीख दबा दी जाती है।
क्या जलवायु नेतृत्व
केवल मंचों तक सीमित है?
क्या पर्यावरण
सिर्फ़ भाषणों की सजावट है?
अगर विकास के नाम पर
प्रकृति को ही मिटा दें,
तो यह कैसा विकास है
जो भविष्य को अनाथ कर दे?
जब अरावली कटेगी,
तो बाढ़ भी आएगी,
सूखा भी आएगा,
हवा ज़हर बनेगी,
पानी नीचे भागेगा,
और तब हम पूछेंगे—
गलती कहाँ हुई?
न्यायालय का निर्णय
कानूनी हो सकता है,
पर क्या प्रकृति ने
कभी अपनी पैरवी की?
क्या क़ानून प्रकृति से बड़ा है,
या प्रकृति ही
हर क़ानून की जननी है?
आज सड़कों पर
भीड़ नहीं,
चेतना खड़ी है।
नारे नहीं,
सवाल हैं।
यह आंदोलन नहीं—
यह आत्मरक्षा है।
#SaveAravalli
सिर्फ़ एक हैशटैग नहीं,
यह चेतावनी है,
यह निवेदन है,
यह आने वाली पीढ़ियों की
अधूरी चिट्ठी है।
अगर आज पहाड़ नहीं बचे,
तो कल तिरंगे की हरियाली भी
फीकी पड़ जाएगी।
हमें विकास चाहिए—
लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं।
अरावली बचेगी,
तो भारत बचेगा।
यह कविता नहीं—
यह पुकार है।
गौतम झा