अग्नि-साक्षी: सत्ता, न्याय और पतन की गाथा

अग्नि-साक्षी: सत्ता, न्याय और पतन की गाथा

मासूमियत का दहन

जहाँ खेतों में उगनी थी कनक की कोमल बालियाँ,
वहाँ उग आईं सत्ता की ज़हरीली कँटीली डालियाँ।
एक अबोध स्वप्न, जो न्याय की चौखट तक आया था,
उसे क्या पता था, कि रोशनी ने ही अँधेरा फैलाया था?

वह कोमल देह नहीं, वह तो मनुष्यता का दर्पण थी,
जिस पर लिप्सा की कालिख, वीभत्स और अर्पण थी।
जब रक्षक ही भक्षक की खाल ओढ़कर खड़ा हुआ,
तब नियति का हर पन्ना, बेगुनाह के लहू से तर हुआ।

व्यवस्था का छलावा

न्याय की फाइलें जब दीमक की खुराक बनती हैं,
तब एक निर्दोष की चीखें, बस राख बनती हैं।
तारीखों के जंगल में, सत्य अक्सर खो जाता है,
और रसूखदार का हर गुनाह, “प्रक्रिया” में सो जाता है।

दर्शन कहता है: “विलंबित न्याय, अन्याय का ही रूप है”,
यहाँ तो हर मोड़ पर खड़ी, केवल सत्ता की धूप है।
गवाहों के लहू से जब, कागज़ों की प्यास बुझती है,
तब लोकशाही की गरिमा, सरेआम कूच करती है।

काल कोठरी का अट्टहास

लगा कि न्याय हुआ, जब “सेंगर” का सिंहासन डोला,
कानून की कड़वाहट ने, सत्य का अमृत घोला।
अंधेरी कोठरी मिली उसे, जिसे उजाले से नफरत थी,
पाप का घड़ा भरा था, और दंड ही उसकी फितरत थी।

पर समाज का दर्शन देखो, कितना खोखला और बौना है,
जहाँ न्याय की हर चौखट पर, स्वार्थ का ही बिछौना है।
अधर्म केवल वही नहीं, जो अपराधी के हाथों हुआ,
अधर्म वह भी है, जो समाज ने मौन रहकर सहा।

रिहाई और नैतिकता का शून्य

आज फिर वह बाहर है, बेड़ियों से मुक्त, हवाओं में,
मगर क्या वह मुक्त है, उन मासूमों की बद्दुआओं में?
जेल की दीवारें छूटीं, पर क्या आत्मा की ग्लानि छूटेगी?
क्या समाज की टूटी हुई रीढ़, फिर कभी क्या जुटेगी?

यह रिहाई केवल एक व्यक्ति की नहीं, एक तंत्र की हार है,
जहाँ “मुक्ति” के कागज़ों पर, नैतिकता शर्मसार है।
जब भेड़िए खुले घूमते हों, और मेमने डरे-सहमे,
तब समझना कि हम “कलयुग” के, सबसे घिनौने दौर में जन्मे।

उपसंहार

शरीर मुक्त हो सकते हैं, पर कर्मों का कारावास शाश्वत है,
इतिहास के पन्नों पर लिखा, यह पाप अमिट और जीवंत है।
जब तक सिंहासन, सत्य से बड़ा बना रहेगा,
तब तक हर “उन्नाव” का घाव, दुनिया में हरा रहेगा।

 गौतम झा

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