अधेड़ उम्र वह पड़ाव है, जहाँ बचपन की सरलता और जवानी की आकांक्षाओं के बीच दुनियादारी, स्वार्थ, परिवार और बदलते रिश्तों की सच्चाई सामने आती है।
अधेड़ उम्र
ज़िंदगी परत-दर-परत खुलती है,
अधेड़ उम्र की यही विकट परिस्थिति है।
स्वार्थ से चलती हर एक रणनीति है,
पूछो तो सबकी अपनी-अपनी आपबीती है।
सरलता में बचपन बीता,
मोहकता में यौवन रीता।
जब आकांक्षाओं ने ली अंगड़ाई,
दुनियादारी और भी भारी हो आई।
सामर्थ्य बड़ा उद्दंड है,
बात-बात पर मन प्रचंड है।
भौतिकता ही अब मापदंड है,
परिवार भी खंड-खंड है।
सनातन में अब कहाँ सहज सहयोग है?
आपस में भी मज़हब वाला रोग है।
सरल और सहज होना ही संयोग है,
संविधान में जैसे ‘सेक्युलर’ एक प्रयोग है।
गौतम झा
अधेड़ उम्र
ज़िंदगी परत-दर-परत खुलती है,
अधेड़ उम्र की यही विकट परिस्थिति है।
स्वार्थ से चलती हर एक रणनीति है,
पूछो तो सबकी अपनी-अपनी आपबीती है।
सरलता में बचपन बीता,
मोहकता में यौवन रीता।
जब आकांक्षाओं ने ली अंगड़ाई,
दुनियादारी और भी भारी हो आई।
सामर्थ्य बड़ा उद्दंड है,
बात-बात पर मन प्रचंड है।
भौतिकता ही अब मापदंड है,
परिवार भी खंड-खंड है।
सनातन में अब कहाँ सहज सहयोग है?
आपस में भी मज़हब वाला रोग है।
सरल और सहज होना ही संयोग है,
संविधान में जैसे ‘सेक्युलर’ एक प्रयोग है।
गौतम झा
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