
मिथिला-गाथा
जनकपुर की पुण्यभूमि, जहाँ जानकी उत्पन्न हुई,
यज्ञ-अग्नि में जब नीति जगी, मानवता निखर गई
ऋषि-मुनि के मंथन से उभरा धर्म का उजला दीप,
जनकराज की वाणी में बसी- नीति, करुणा और हित।
कोसी, कमला, बागमती, गंडक—जलाशयों की वह लय,
सिरों पर हरित तटबंध, खेतों में अनाज की मय।
हल की रेखा से धरती में उपजी अन्न-रस की धन्यता,
बूँद-बूँद में रची परम्परा, श्रम-गाथा की सभ्यता ।
मधुबनी की चित्रावलियाँ —कोहबर में सजी कथा,
अरिपन की विन्यासों में नाचती स्त्री की स्नेहगाथा।
हाथ-चित्र की सूक्ष्म रेखा, देव-नारी के अभिनयरूप,
कला बनकर उतरती है धरती पर, हर घर में एक कल्परूप।
विद्यापति के पद-संग्रह में संगीत-रस का प्रवाह,
मैथिली भाषा के वाक्य में आनन्द की पावन आभा।
ध्रुपद-गायन की विरासत, दरभंगा के शिल्प-श्रृंगार,
स्वर-साधना से जुड़ा इतिहास, कलाओं का दीर्घ आधार।
सीतामढ़ी—जानकी का जन्मस्थान, मातृ-गौरव की धरा,
सोहर-गीतों की मृदुलता, अंचल में बसी पावन परंपरा।
मधुबनी के गोष्ठी से लेकर सहरसा के लोक-नाट्य तक,
प्रत्येक ग्राम-प्रवेश पर संस्कृति की अविरल अन्तरा।
समस्तीपुर के खेतों की महक, मधेपुरा के मंदिर-प्रकाश,
सुपौल की सहनशीलता, झंझारपुर का लोक-आनंद विशाल।
दरभंगा के महल से लेकर नगर-गाँव के सरल द्वार,
हर युग ने जोड़ा एकांत में अपना गीत, अपना उपहार।
नारी का अंचल यहाँ मानो धरती का स्वर्ण-आभूषण,
लाल किनारी वाली साड़ी, सिंदूर-रेखा, मिलन-सौजन्य का बंधन।
अतिथि-भाव की मधुरता, बोली की मीठी लहर,
हृदय में समेटे परम्परा, सहज अपनत्व का आधार।
छठ-व्रत की आरती, अस्ताचल पर अर्घ्य-प्रणाम,
किरणों में उतरे आस्था, नदियों में प्रतिबिम्बित ब्रह्म-धाम।
सामा-चकेवा का मेला, कजरी-चैती का गीत,
ऋतुओं के चक्र में बुना, मानव-जीवन का संगीत।
बाढ़ ने जब आँसू बहाए, कोसी की क्रूरता आई,
फिर भी मनुज का धैर्य न थमा, पुनर्निर्माण की राह पाई।
बांध -निर्माण, पुल, पथ—संकल्पों ने दी नई उड़ान,
दुर्दिन से उभर कर फिर खड़ी हुई मिथिला की आन।
गुरुकुल से विश्वविद्यालय तक ज्ञान की अविरल परंपरा,
अध्ययन, विमर्श, साहित्य—सबने जोड़ दिया नई नीति-धारा।
नव-उद्यम, कला, ज्ञान का मेल—पर जड़ें नहीं छोड़ी यहाँ,
अतीत की मृदु याद में भी भविष्य के सूर उठे वहाँ।
माछ-भात की सरलता, मखाना-मालपुए का स्वाद,
किसान की हथेली पर लिखा है यहाँ जीवन का उद्धार।
श्रम-संस्कार, मेहमान-प्रेम, लोक-गीतों की शुद्धता,
ये हैं मिथिला के चार स्तम्भ—सत्य, करुणा, शील, सौजन्यता।
जनकपुर से प्रारम्भ हुई संस्कृति की पावन धारा,
जानकी-भूमि की महिमा आज भी हृदय का नवतारा।
न भूतो न भविष्यति-सा स्मरण, अमर ये परम्परा रहे,
मिथिला—भारत की शोभा बनी रहे, युगों तक जगमगाते रहे।
- गौतम झा